सोमवार, 23 फ़रवरी 2009
"किसी के आने की भनक आज है"
बुधवार, 4 फ़रवरी 2009
"फिर कैसे वो खुशी दे गई..."
दिन भी तो था हसीन
फिर क्यों लगता है
ये मौसम अन्जाना सा,
रास्ते पर है वीरानीं
महफ़िल भी तो है सूनी सी
फिर क्यों छाई है
हम पर मदहोशी सी,
गुम न है कोई
बस है इक पुकार की दूरी पर
फिर क्यों न निकलतीं है
हमसे इक आवाज कोई,
कुछ न चाहा था हमने
न कुछ भी महसूस किया
फिर कैसे वो खुशी दे गई
जैसे थी पहचान कोई !!
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
"मेरी जिन्दगी का पहला प्यार..."
मै इस बात की कल्पना भी नही कर सकता की जिस दिन मुझे मेरी मंजिल मिलेंगी, जो मेरी शुरूआती जीवन का आधार होगी। उस दिन मै अपनी खुशी महसूस कर पाऊंगा या नही, लेकिन जो मेरे पैदा होने से, बोलने के शुरुआत से, पहले कदम को बढ़ाने से देखते हुए तथा पहले अक्षर के ज्ञान से, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय की पढ़ाई तक अपने आंखों में सपने कैद किए हुए है। उस दिन की प्राप्ति पर वो कितने खुश होंगे इस बात की गणना मै कल्पना में भी नही कर सकता हूँ।
ये उनके सपने, आशा और अपेक्षा की बात हुई, अब जरा उनके प्यार की बात करते हैं। माँ-पापा के प्यार की तुलना क्या किसी से भी की जा सकती है? मुझ से तो नही हो पाता और शायद कोई कर भी नही सकता है। मै ख़ुद के प्यार से भी उनकी तुलना करने में असमर्थ हूँ, क्योंकि मेरी दुनिया में बहुत से लोग है और उनकी तो दुनिया ही हम से ही सम्बंधित है या कह सकते है की उनकी दुनिया ही हम से है क्योंकि हम ही उनके विश्वास है और हम ही उनके घमण्ड भी है
अपने बच्चो को एक कमीं भी न महसूस होने देने के लिए न जाने उन्होंने अपनी कितनी छोटी-छोटी खुशियों को दबाया है और उस पर उनको और ज्यादा खुशी मिलती है। क्योंकि हम खुश होते है। हमारी छोटी से बड़ी जरूरतों का अहसास उन्हें बिना हमारे बताएं ही हो जाता है और फिर उसको पूरा करने की समस्या अब उनकी हुई और अब भी उनको उसे पूर्ण करके ही संतुष्टि मिलती है।
हमें स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते हुए, हमें गर्व देते हुए और हमारी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करते हुए अब वों बूढ़े हो चले है, उनके कंधे अब जल्दी थकान महसूस करतें हैं, लेकिन तत्परता और जुझारूपन अब भी पहले से ज्यादा है और हमें हमारी मंजिलो तक पहुँचाने में हम से कहीं ज्यादा सहयोगी है। हम कही गिरे तो संभाला इन्होने ने ही है और ऐसी मजबूती दी की ख़ुद के फिसलने की बात गई, हम औरों को सम्भालने लगें।
लोग कहते की मै अभी बच्चा हूँ लेकिन उन्होंने कभी मुझे बड़ा महसूस ही नही किया बचपन में भी मुझे नींद न आने पर माँ मेरे पास बैठ कर तब तक कहानियाँ सुनाया करतीं थी जब तक की मै सो न जाऊँ और अब भी वो साथ हो और मै सोऊ न तो वो मेरे सोने तक अपनी कहानियाँ सुनाया करतीं हैं।
लेकिन एक चीज है अब वो मुझे जिम्मेदार मानने लगें है और ये की मै स्वयं अपनी जिंदगी की मंजिल तय करते हुए उसका रास्ता बना लूँगा इस विश्वास के साथ उन्होंने कभी मुझ से ख़ुद का कोई सपना पूर्ण करने की अभिलाषा नही रखीं। अगर आकांक्षा रखी भी तो सिर्फ़ मुझ से गर्व पाने की, मुझे खुशी पाने की और दुनिया में मेरी एक पहचान की।
बस यहीं हैं मेरी जिंदगी का पहला प्यार और मेरे माँ-पापा के सपने और उनकी प्यार भरी दुनिया!!
बुधवार, 10 दिसंबर 2008
"इक याद का तोहफा"
- आज इक याद ने तोहफा दिया मुझको
- फिर उसकी दोस्ती का भरम दिया मुझको,
- कभी जो जख्म मिलें थे उससे तमगों की तरह
- फिर उसमे कमियों ने दर्द दिया मुझको,
- इक अहसान इस याद का फिर भी रहा
- पिछले दर्द की दवा मिलीं इक दर्द से मुझको,
- छिपाकर गम हमने हंसने की कोशिश की
- मगर झूठी हँसी ने सिर्फ़ आंसू दिया मुझको,
- वक्त का क्या पता कब साथ मेरा छोड़ दे
- काश इक बार वो फिर साथ मिलता मुझको,
- तन्हाई जब भी बढ़ी यादों की खिड़की खोल दी मैंने
- जहाँ मिल भी जाती दोस्ती की सादगी मुझको,
- उम्र के रास्ते पर चलते गए अब हम
- गुजरे हुए मील के पत्थर दिखते गए मुझको,
- वक्त दबे पावों जायें और आँखे मीचें उसकी
- शायद वो मेरे स्वर-शब्दों से पहचाने मुझको,
- बड़ी मुश्किल है अब मेरी बागबाँ से उसकी दोस्ती चलना
- है इबादत का सिला ये तो कबूल नही मुझको,
- दोस्त जाकर उससे कहना कि उसे भूल गए हम भी
- गौर से देखना आँखों से क्या कहता है वो मुझको !!
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
नेता जी कुत्ता किसे बोले..?
सबसे ज्यादा शर्मशार किया केरल के मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन ने किया जिन्होंने देश के एक शहीद वीर सपूत मेजर संदीप उन्नीक्रष्णन के सहादत से गर्वित परिवार के शम्बोधन में कहा की, "अगर संदीप सेना के शहीद मेजर न होते तो उनके यहाँ कोई कुत्ता भी ना जाता"।
एक तो इस वीर के पिता ने ऐसे ही नही किया वो है इनको धक्के मारकर भागने का, खैर ये हमारी संस्कृति में ही नही है तो आप कैसे कर सकते थे। अच्युतानंदन जब इस घर का संबोधन कर रहे थे, तो उन्हें ये समझ में नही आया की वो एक शेर के परिवार के बारे में बोल रहे है। जिसकी एक झलक से ही कुत्तो का क्या होता है। ये तो सब जानते है लेकिन ये संबोधन अगर इन्होने ख़ुद के जाने से किया है तो ये उपमा पाकर वो मासूम सा जानवर भी शर्म करे जो अपनी वफादारी के लिए प्रसिध्द है। उनको ये नही पता की इन शेरो ने उन जैसे कितने नेताओ को जेड और जेड श्रेणी में सुरक्षा मुहैया कराते हैं
वीरों की सहादत का मजाक उडाने वाले को अगर पद से हटाने की मांग देश की राजनीती के एक मशखरे ने की है तो ये बिल्कुल जायज है, वैसे इनके इस अपराध की सजा सिर्फ़ आलोचना ही नही है इसके लिए भारत सरकार को भी सख्त कदम उठाना चाहिए ताकि इन वीरो की शहादत के गर्व को दुबारा कोई छेड़ने की हिम्मत न कर सकें।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
"कहाँ सो रहे हैं वो देश के तथाकथित सपूत..?"
आज जब भारत आतंकवाद के लगभग पूर्ण गिरफ्त में है तो क्या इस देश का जागरूक वर्ग इस आतंकवाद से लड़ने की एक आस उन लोगों से ना रखें जो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए ख़ुद को देश का सपूत या प्रदेश का प्रतिनिधि या क्षेत्र विशेष का ठेकेदार समझते हैं।
क्यो ना ये ठेकेदार देश के जवानों के पूर्व ही उन आतंकवादियों के इरादों को जय श्री राम, जय बजरंगबली या फतवा जारी कर अल्लाह हो अकबर कहते हुए या अलगाववाद का चोला पहनकर देश को लाल कराने के बजाय या फिर कक्षा पहने हुए हाथ में डंडा लेकर स्वयं ही निष्फल करें जैसा कि अक्सर ये साम्प्रदायिक तथा अलगाववादी घटनाओं को अंजाम देने में करते आ रहे है।
हम देश में आंतरिक आतंकवाद से सर्वाधिक ग्रसित मुम्बई में सस्ती लोकप्रियता बटोरने वाले और ख़ुद को नायक समझने वाले देश के कुपूतो से भी ये आशा रखते हैं कि वो मुम्बई में दक्षिणी भारतीय और उत्तर भारतीयों से अलगाव करने के बजाय उन आतंकवादी गतिविधियों में सम्मिलित भीड़ को भागने का सामर्थ्य दिखाएँ, ताकि देश उनके सच्चे महाराष्ट्र प्रेम को पहचान सके और उनसे घ्रणा करने के बजाय गर्व से सलाम कर सकें।
खैर इनसे ये आशा रखना ख़ुद से एक बेईमानी होगी क्योकि उनके सामने एक आदर्श है कि इस देश में ये रीति रही है कि मूलकर्तव्यों को ताख पर रखकर देश को प्रथक करने में पूर्ण सहयोगी नेताओ को इस देश कि जनता ने ही कुछ प्रदेशो में मुख्यमंत्री तथा कुछ को उच्च पदों पर आसीन कराया है।
आख़िर हम कब तक अपने देश के कर्णधारों से देश में हुई किसी भी अराजक घटनाओं कि निंदा सुनते रहेंगें। क्या कभी हमको उनके द्वारा की गई किसी कार्यवाही से संतुष्टि प्राप्त हो सकेगी ? इसका जवाब खोजने से पूर्व हम ये जानना चाहेंगे कि मुम्बई में हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले को निष्क्रिय करने में ख़ुद को महाराष्ट्र का ठेकेदार कहने वालों ने क्या किया ? क्या वो सिर्फ़ दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीयों की ही पहचान कर पा रहे हैं ? या फिर वो आतंकियों के खौफ से उनकी पहचान करने में असमर्थ है, उनको ये नही दिख रहा है की भारत की मुम्बई की सुरक्षा के लिए जो शहीद हुए वो एक भारतीय थे और ये महाराष्ट्र के तथाकथित सपूत गोलियों की सनसनाहट में बिलों को तलाश कर गुम हुए जा रहे थे।
ये सवाल सिर्फ़ मुम्बई ही नही अपितु देश के समस्त तथाकथित क्षेत्रीय ठेकेदारों से उठता है कि आतंकवाद तथा अलगाववादी घटनाओं के घटित होने पर तथा अराजकता एवं अशान्ती की समस्याओं के उत्पन्न होने पर अपने कानों में तेल डालकर आख़िर "कहाँ सो रहें होते हैं वो देश के तथाकथित सपूत..?"
सोमवार, 10 नवंबर 2008
"मीत बना मै घूम रहा हूँ"
साथ लिए वीरानी को,
यादों का अवरोध लगाकर
बस यह आस लगता हूँ !!
काश कहीं मिल जातें अपने
मिल जाता फिर उनका साथ,
संग होते सब मित्र हमारे
साथ लिये सर्मध्दि को,
मुझे दूरी का हे मित्रों
कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिलेंगी हमकों मंजिल इकदिन
तब साथ रहेगें बन हमसाया !!
"इक और सुबह आई"
शांत सी जिंदगी में कमी का अहसास दिला गई
हम न थे कभी तनहा फिर भी तनहाई महसूस करा गई
खुशियों में थोडी सी कमी का अहसास दिला गई
जिंदगी तो खुशनसीब है की दोस्ती साथ निभा गई
देखों आज फिर वो सुनहरी सुबह आ गई
वादा था किसी का लेकिन हमें इंतजार न था
यादें ही मुबारकबाद देकर उसका वादा निभा गई
इंतजार न था इसका लेकिन अपने आने का अहसास दिला गई
देखों दोस्तों आज फिर वो सुनहरी सुबह आ गई
इस दिन का अब नाम क्या रखूं ये सवाल उठा गई
जवाब मांगते ही बीतें दिनों की याद दिला गई
यादें भी दिल में इक कसक उठा गई
जरूरत तो नही लेकिन इक कमी का अहसास दिला गई
देखों मित्र दोस्ती के दिन की खिलखिलाती सुबह आ गई !!
शनिवार, 8 नवंबर 2008
"इक मित्र आई थी"
रहकर दुनिया की नजरों में