सोमवार, 27 जुलाई 2009

"मासूम शाम आ गई..."

कई दिनों से यहाँ मै लिखने से दूर रहा। इस बीच मैंने कुछ लिखा भी तो उसे यहाँ लिखने का मन नही हो पाया और कुछ व्यस्तता ऐसी रही की यहाँ से दूरी भी बनी रही। एक बार फ़िर आप लोगो से उस दूरी को हटाते हुए, मै यहाँ अपनी कुछ भावनाओं को कुछ पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ........




खोई हुई हैं महफिलें
खोया है इक समां प्यारा
तलाश करने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई,

खोये हैं जीवन के कुछ पहलू
खोये हैं कई फ़साने भी
सबको समेटने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई,

खोया है इक जश्न सुहाना
खोया है एक कारवां भी
पाने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई

अब प्रतिज्ञ हूँ न कुछ खोऊँ
अल्फाजों की जागीर भी
दास्ताँ सहेज लूँ डायरी के पन्नो में
लफ्ज कभी भी मिल जायें जो ,
लेखक बनने की जब भी कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई !!

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

"रक्तदान महादान..."

अभी कुछ दिन पहले मै एम्स में रक्तदान करने गया था। हांलाकि इसे दान की श्रेणी में नही रख सकते क्योंकि मै किसी अपने की जरूरत पर रक्त देने गया था। मेरे मित्र विकास के पिता जी का यहाँ ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन होने वाला था, इसीलिए यहाँ के डॉक्टरों ने चार यूनिट ब्लड की मांग की थी। जिसके लिए हम चार लोग ब्लड बैंक पर इकट्ठा होकर फॉर्म भर रहे थे।
तभी एक अन्जान व्यक्ति आकर मुझसे मिला और पूछा की आप लोगो को कितने यूनिट ब्लड की जरूरत है। उसकी हिन्दी बहुत ही अशुध्द थी और उसे समझना भी थोड़ा सा कठिन था। मैंने कुछ सोचकर जवाब दिया चार। उसने फिर मुझसे पूछा क्या आपके पास एक डोनेटर ज्यादा है। मैंने फ़ौरन जवाब दे दिया अभी तो कोई नही है, चार की जरूरत थी और हम चार ही हैं। फिर उसने अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में बताया की वो आंध्र प्रदेश से अपने पिता के ब्रेन ट्यूमर के ऑपरेशन के लिए आया है और उसे भी चार यूनिट ब्लड की जरूरत है, जबकि उसके पास सिर्फ़ तीन ही डोनेटर हैं।
एक बात यहाँ एकदम सच कहूँगा की मैंने उस समय पल्ला झाड़ते हुए कहा की अभी तो हमारे पास कोई नही है लेकिन हमारे साथ के ही एक लोग ने उनकी मदद के लिए किसी को फोन करके बुलाया और उसने आने को भी कहा तो लगा जैसे मेरे ऊपर से कोई बोझ उतर गया है। लेकिन कुछ समय बाद जब ये पता चला की किसी कारण वश वो नही आ रहा है तो सबकी नजर एक बार फिर मेरे ऊपर टिक गई। मैंने अपनी नजरे भी बचाने की कोशिश की। तब उस व्यक्ति जिसका नाम किरण कुमार था की मायूस आँखें देखकर मुझे ग्लानि महसूस हुई और मैंने ख़ुद को धिक्कारतें हुए ये कहा की सबको मानवता का पाठ पढाने वाला आज ख़ुद क्यो इससे भाग रहा है और फिर अपनी प्रकृति के ही अनुरूप मैंने इस ऊहापोह से निकलने के लिए, मदद की चाह में और उनकी रक्त की जरूरत की पूर्ति के लिए अपने एक छोटे भाई सौरभ को फोन किया। जो यहाँ पहाड़गंज में रहकर एम. बी. ए. की तैयारी कर रहा था।
मैंने उसे पूरी स्थिति की जानकारी दी और उसके स्वयं पर छोड़ दिया की वो उन्हें आगामी कई प्रतियोगी परीक्षाओं के नजदीक रहने के बावजूद जिसमे पहली परीक्षा पॉँच दिन बाद थी, रक्तदान करेगा या नहीं। तभी उसने मुझे और असमंजस में ये कहकर दल दिया की भय्या आप जैसा कहिये। उस समय मुझे कुछ सूझ नही रहा था। मैंने फिर उससे धीमे से कहा की मुझे लगा है तभी मैंने तुम्हे फोन किया है और शायद उसने मेरी परेशानी को समझकर कहा की मै आ रहा हूँ। मैंने उन लोगो को बताया की हाँ वो आ रहा है और हम चारो खून देने चले गए।
जब मै बहार निकला तो किरण मुझे वही बहार मिला। उस समय सुबह के करीब ग्यारह बज रहे थे। वही पर मैंने उसका मोबाईल नम्बर लिया और हम जूस पीने चले गए। सौरभ कुछ देर बाद एम्स पहुँचा। तब तक ब्लड बैंक में काफी भीड़ हो गई थी और हम लोग नम्बर लगाकर वहीं काफी देर तक खड़े रहे। फिर कुछ देर बाद लंच ब्रेक भी हो गया और समय पर समय लगता चला गया। सौरभ के साथ उन तीनो का ब्लड करीब साढ़े थीं बजे निकाला गया। खून देने के बाद वास्तव में वें लोग काफी कृतज्ञ थे और भविष्य में कभी हैदराबाद आने पर बार-बार मिलने पर ही जोर दिया। वहां से उन्होंने हम लोगो को जबरदस्ती ले जाकर जूस पिलाया और वहीं से हम लोग विदा हुए।
एक दिन बाद जब वहीं एम्स में किरण की माँ विकास से मिली तो उन्होंने उसे बहुत सा आर्शीवाद दिया और इस बात पर कृतज्ञता व्यक्त किया की हम लोगो ने वाकई में उनकी बहुत मदद की है। शायद इसका फल भी मिला है, सौरभ को आगामी परीक्षा में सफलता मिली और उसका चयन टाटा-धान अकेडमी मदुरई में एम. बी. ए. के लिए हो गया।

गुरुवार, 21 मई 2009

"आज स्वयं (लोकेन्द्र) के जन्म दिन पर..."

आज २१ मई के दिन जीवन में पहली बार है जब मै अपने परिवार और मित्रों के साथ नहीं हूँ और जन्मदिन की शुभकामनाएं और आर्शीवाद प्रत्यक्ष रूप से नही बल्कि मोबाईल और इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कर रहा हूँ। आज मै पहली बार अपने जन्म दिन पर दिल्ली में हूँ। जिस कारण आज के दिन मै पूर्ण रूप से अपने परिवार और अपने मित्रों की कमीं महसूस कर रहा हूँ, या कह सकतें हैं की मै लखनऊ की कमी महसूस कर रहा हूँ। जहाँ हमारी यादें बसती हैं, जहाँ हमारी मस्ती फिरती हैं या जहाँ हमारे मित्र रहते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति की तरह ये दिन मेरे लिए भी एक अहमियत रखता है। लेकिन लखनऊ में रहते हुए और अपने परिवार के सदस्यों तथा मित्रों से घिरे रहते समय इस दिन की विशेषता का उतना ज्ञान मुझे नही था, जितना की आज सुबह नींद खुलने के समय हो रहा था। क्योंकि लखनऊ में रहते समय सुबह बिना किसी उठाये जब भी नींद खुलती थी तो अपनो के चहरे मुझे घेरे दिखाई पड़ते थे, शुभ कामनाओं के साथ ये कहते हुए की जल्दी ब्रश करके आओ नही तो नाश्ता ठंडा हो जायेगा, मिठाई खत्म हो जायेगी और न जाने क्या-क्या सिर्फ़ अपनी ही मस्ती में। और वर्तमान में यहाँ आज सुबह मेरे साथ है सिर्फ़ मेरा अकेलापन, जो न चाहते हुए भी मेरा अपना है और उसका एक ही तोहफा है तनहाई।
आज भी बारी-बारी से सभी अपनो से मुझे आर्शीवाद और शुभ कामनायें प्राप्त हुई हैं। लेकिन मुझे उस तोहफे की कमी काफी महसूस हो रही है जो लखनऊ में मुझे बिना मांगे मिल जाता था। वो है मेरे माँ-पापा, भय्या का आर्शीवाद और मेरे दोस्तों का साथ।
आज के दिन मै इस बात को कत्तई नहीं छिपऊँगा की दोस्तों आज मुझे आप सब की कमीं काफी महसूस हो रही है। काश आज वो तोहफा मुझे हमेशा की तरह मांग कर भी मिल जाता।

सोमवार, 18 मई 2009

"किसी का इंतजार बाकी है..."


न कोई बात बाकी है
न कोई रात बाकी है
तमन्नाओं में जाने क्यूं
अब भी इक शाम बाकी है,

न कोई ख्वाब बाकी है
न कोई सफर बाकी है
डायरी में जाने क्यूं
अब भी कुछ याद बाकी है,

न वादा था किसी का
न कोई मुलाकात बाकी है
दिल में न जाने क्यूं
किसी का इंतजार बाकी है !!

शनिवार, 16 मई 2009

"जागरुक मतदाता, उभरता लोकतंत्र..."

वर्तमान चुनाव के परिणाम को देखकर एक संतोषजनक स्थिति उत्पन्न होती है। मजबूत पार्टी के रूप में तो मतदाताओ ने कांग्रेश को प्रस्तुत किया है लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में मजबूत नेता को अभी आना बाकी है। इस बार के चुनाव में मतदाताओ ने अत्यधिक अवसरवादियों को बाहर का रास्ता दिखाया है, जो की निर्णायक सरकार के बनने का भी सफल मार्ग है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेश की बढती सीटों को देखकर यह प्रतीत हो रहा है की यहाँ की जनता अब समप्रदायिकता से उबरकर शान्ति चाहती है, बेरोजगारी भत्ता की जगह रोजगार की गारंटी चाहती है, जातिवाद के सोशल इन्जीनरिंग से निकल कर देश की प्रगति एवं कुशल प्रशासन चाहती है।
उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट के मतदाताओ के एक विशेष वर्ग ने एक बाहुबली पर एक विद्वान नेता मुरली मनोहर जोशी को जीत दिलाकर, साथ ही तमिलनाडु के शिवगंगा लोक सभा सीट पर बहुत ही करीबी और रोमांचकारी मुकाबले में देश के वर्तमान गृहमंत्री एवं एक कुशल नेता पी. चिदम्बरम को जीत दिलाकर संतुष्टि दी है।
बिहार में ज.द.यू . के प्रदर्शन और नीतिश कुमार के स्पष्ट बयान न आने से एवं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेश की विजयी सीटों की संख्या और ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षा को देखते हुए रेलवे मंत्रालय एक बार फ़िर पश्चिम बंगाल या बिहार की पटरी पर दौड़ती हुयी प्रतीत होती है। ये तो बस अनुमान लगाये जा रहें हैं, अभी तो मंत्रिमंडल का आखिरी स्वरुप आना बाकी है।
भारत की जनता निर्णायक सरकार के रूप एक सर्वश्रेष्ठ मंत्रिमंडल को देखना चाहती है। जिसमे वर्तमान के असफल मंत्रियों और अवसर वादियों की झलक न दिखलाई दे।

शनिवार, 9 मई 2009

"गुलाल..."

अभी हाल ही में मैंने एक फ़िल्म 'गुलाल' देखी है। लेकिन मै इस फ़िल्म को अच्छे से समझ नही पाया हूँ। शायद इसीलिए मै अब तक इस फ़िल्म को कई बार देख चुका हूँ। लेकिन हर बार इस फ़िल्म के छोटे पर बहुत मारक संवाद ने इसके बारे में मेरे विचार को लगातार बदला है और मै इस द्वंद में रहा हूँ की ये फ़िल्म कोई संदेश देती है या फ़िर इसका नकारात्मक अंत किसी यर्थात के दर्शन कराती है। ये द्वंद भी मेरे इस फ़िल्म को कई बार देखने के फलस्वरूप ही उत्पन्न हुआ है क्योकि फ़िल्म देखने में हर बार मेरे साथी अलग-अलग थे और उनके विचार और किरदार की पसंद भी भिन्न थे। अधिकतर लोगो को मैंने अपने परिवेश के मुताबिक किरदारों को पसंद करते देखा है। लेकिन एक दिन जब हम एक समूह में बैठे इस विषय पर चर्चा कर रहे थे तभी हमारे बीच बैठे एक शख्स जो की एक जाति विशेष के घोर विरोधी लग रहे थे ने अपनी पसंद फ़िल्म के एक किरदार करन (आदित्य श्रीवास्तव) को बताया। तो हम अचम्भित भी थे और हँस भी रहे थे। खैर हमारी हँसी ने ही उनको अपने उत्तेजना भरे बयान पर शर्मिंदा कर दिया और वो हमारे जवाब और कटाक्ष से भी बच गए। इस फ़िल्म के समस्त पात्रो ने अपने-अपने अभिनय को तो बखूबी निभाया है लेकिन इस फ़िल्म में मौजूद इसके संगीत निर्देशक एवम् अभिनयकर्ता पियूष मिश्रा ने अपने अभिनय एवं व्यंग दोनों से ही सबका ध्यान आकर्षित किया है। इनके द्वारा वर्तमान के पथ से भटके नौजवानों पर किए गए व्यंग पर यर्थात के दर्शन तो होते ही है साथ ही हंशी भी आती है।

"ओ
रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के तिल में है

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंगलिसों की मिल में है!!
"

यहाँ हमें कुछ और भी देखने को मिला वो है विश्वास घातियों के अनेक रूप और सच्चे साथियों के कुछ विशेष रूप। दुनिया जीतने के अपने ख्वाब को साकार करने के लिए ग़लत मार्ग के चुनाव का फल तो यहाँ ग़लत दिखाया गया है। लेकिन उसके अंत में वर्तमान के मुताबिक ही बुराई की जीत भी दिखायी गई है। जो इस बात को भी सत्य करती है की वो उससे ईमानदार इसलिए है क्योकि उसे चोरी के मौके कम मिले हैं। शायद इसीलिए फ़िल्म के अंत में प्यासा फ़िल्म के पुराने गाने को नये रूप से प्रस्तुत कर यर्थात का क्षणिक अनुभव कराया गया है।
"ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..."

शनिवार, 2 मई 2009

चुनावी गुफ्तगू...

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में एक निष्पक्ष, ईमानदार, और मजबूत सरकार के गठन का एक ही हल है वो है मतदान| देश के उज्जवल भविष्य के लिए हमें ही ५४३ चुन्निदा चेहरे विश्व जगत के सामने प्रस्तुत करने होगें।
जिसमे अभी तक के मतदान प्रतिशता को देखकर काफी अफसोस हो रहा है।
ये कम मतदान विशेष रूप से क्षेत्रीय पार्टियों की जीत में सहायक होती। जिनका भारत के पिछडेपन में विशेष योगदान भी रहता है।
कुछ गलतिया हममे भी है हमने अक्सर लोगो को सामप्रदायिक ताकतों,अलगाव वादियों, जाति वादियों और बाहुबलियों को ही वोट करते देखा है। फिर भी सबको भारत की प्रगति ही दिख पड़ती है।
और तो और देश की जो सबसे सम्मानित दो पार्टिया है उन्ही के द्वारा जब ऐसे गलत लोगो का चुनाव कर टिकट दिया जाये तो ये काफी शर्म भरी बात है।
मुझे इसके विषय में कुछ जानकारी डॉक्टर उत्तमा जी के ब्लॉग से मिली लेकिन उन्होंने सिर्फ बाहुबलियों का ही जिक्र किया लेकिन कुछ विशेष पहलू को उन्होंने भी अनदेखा छोड़ दिया हैं|| राजनीति में परस्पर घोर विरोधी रही दो पार्टियों ( भा.ज.पा. और स.पा.) के बारे में, इन दोनों की आग में न जाने कितने लोग क्षेत्रीय स्तर पर एक दूसरे के जान के दुश्मन बने बैठे हैं और इधर इनकी मित्रता देखिये की एक के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ दूसरे ने अपना कोई प्रत्याशी ही नही खडा किया| ये भारत की किस राजनीति को दर्शाता है|
सब सत्ता में आने से पहले या आने के लिए एक दूसरे के आरोप को सिध्द करते हुए जेल में डालने की बातें करेंगे, CBI जेब में होने तक का दावा भी करेंगे लेकिन सत्ता में आने के बाद एक ही सिक्के के दो पहलू नजर आयेंगे, की न जाने आगे ऊंट किस करवट बैठे|
सब मजबूत सरकार बनाने का दावा करते है लेकिन मंत्री पद किसी तोड़ फोड़ में माहिर इन्सान को ही देंगे जो उनके गंठबंधन को बनाये रख सकें| शायद ही हम आगे अमरीका की तरह देख सकें की हमारे देश के जुझारू नेताओ को ही मंत्री पद का भार सौपा गया है चाहें वो विपछी पार्टी से ही क्यों न हो और सरकार के बनाने के किसी भी गठबंधन में किसी प्रकार की सहभागिता न हो।

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

दोस्त मिलतें हैं यहाँ दोस्त को बनाने के लिए...

सच्चे दोस्तों का साथ पाकर जो खुशी, संतुष्टि और सम्पूर्णता का अनुभव होता है वह जिंदगी के कुछ खास सुखद एहसासों में से होती है। जहाँ लोग जिंदगी में सिर्फ़ एक सच्चे मित्र के मिलने की कामना करतें हैं वहीं ये खूबसूरत रिश्ता एक अच्छी संख्या में मेरे साथ है। मै यहाँ अपने मित्रो की संख्या उपस्थित कर उनको सीमित नही करना चाहूँगा और न ही उनके नाम को यहाँ देकर किसी रूप से किसी भी चर्चा को जन्म देना चाहूँगा। क्योंकि इसके कारण पहले भी मुझे अपने मित्रो के बीच कुछ मजाक भरे सवालों की जवाब देही मेरे द्वारा दिए गए उनके नाम के क्रम से तथा उनकी कम चर्चा के कारण देना पड़ा था।
अभी हल ही में एक समाचार पत्र के पन्नो को पलटते समय एक लेख पर नजर जाने उसे न पढ़ने की इच्छा रहते हुए भी मै उसे पढ़ गया क्योंकि वो दोस्त बनाने की कला बता रहा था और मै दोस्ती को जिंदगी का एक उपहार मानता हूँ जो किस्मत से मिलती है। उस लेख में इस बात का जिक्र था की अगर आप ख़ुद से ज्यादा दूसरों में दिलचस्पी लेगें तभी आप लोगों को अपना मित्र बना सकते हैं और अगर दूसरों को प्रभावित करने के लिए स्वयं में ही रुचि रखतें हैं तो आपको तनाव और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
इन पंक्तियों का जब मैंने अपने मित्रो के सम्बन्ध में समीक्षा किया तो पाया की वाकई में हमारे बीच में 'मै' नाम को वरीयता नही है और जिनका 'मै' में यानि की ख़ुद में ही सिर्फ़ रूचि थी अब वो हम में शामिल नही है। अब मै इसकी व्याख्या न करते हुए इस नकारात्मक पहलू से एक बार फिर बचाना चाहूँगा।
अपने मित्रो की ख़ुद से ज्यादा अपनो को वरीयता देने में अक्सर मैंने देखा है की अगर कोई ख़ुद बीमार है तो उसे कम चिंता रहती है और अगर कोई अपना बीमार रहता है तो उसे कुछ ज्यादा ही चिंता रहती है। ये खैर बहुत छोटा सा ही उदहारण है। लेकिन इस बात की चर्चा मै यहाँ जरूर करूँगा की अगर मै अपने उद्देश्यों को पाने में तेजी से अग्रसर हूँ तो इसमे मेरे सबसे बड़े सहयोगी मेरे परिवार के साथ मेरे मित्र ही हैं। इसीलिए हमारे मित्रो के संगति और चर्चाओ में कुछ खास जरूर रहता है की हमारे परिवार भी हमारी मित्रता पर गर्व महसूस करतें हैं।
अभी हम जिंदगी के ऐसे बहुमूल्य समय से गुजर रहें हैं की हमें अपनी मंजिलों को पाने के लिए कुछ भावनाओ का त्याग करना पड़ता हैं और इसमे भी हमारे एक सहयोगी के रूप में हमारे मित्र ही है।
मेरे मित्र तो हमारी दोस्ती का निबाह बहुत सच्चाई से करते हैं, उनके साथ मेरी भी यही अभिलाषा है की जिंदगी के प्रत्येक रिश्ते के साथ मै इस बहुमूल्य रत्न रुपी रिश्ते को हमेशा अपने साथ संजो कर रखूं और ईमानदारी और सच्चाई से इसका निर्वाह कर सकूँ।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

"निष्काम प्रेम बनाम रोमांटिक लव..."

कुछ दिनों पूर्व मेरे द्वारा लिखे गए लेख शाश्वत प्रेम या फटाफट मोहब्बत में मैंने डोपामाईन नामक रसायन के श्राव से प्यार रुपी आन्नद की शुरुआत का जिक्र किया था। परन्तु एक प्रश्न इसमे छिपा रह गया था की आख़िर फटाफट मोहब्बत अर्थात् रोमांटिक लव में और शाश्वत प्यार अर्थात् निष्काम प्रेम यदि एक ही प्रकार के रसायन के श्राव से होता है तो फिर शाश्वत प्यार में क्यों कोई व्यक्ति किसी अनजान व्यक्ति से बिना कुछ पाने की चाहत के बगैर उसका पूरा ख्याल रखतें हैं और यहाँ तक की मर मिटने के लिए तैयार हो जाते हैं।
इस प्रश्न के उत्तर में मुझे एक समाचार पत्र के माध्यम से ज्ञात हुआ की फटाफट मोहब्बत के दौरान दिमाग का तीन हिस्सा काम करता है जबकि शाश्वत प्रेम दिमाग के सात अलग-अलग हिस्सों के एक साथ सक्रिय होने से पैदा होता है। दिमाग के इन सातों भागो के सक्रिय होने के फलस्वरूप डोपामाईन के श्राव से आन्नद, खुशी एवं प्यार की भावनाएं पैदा होतीं हैं। प्यार के इस सर्वोच्च शिखर पर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति से बिना किसी चाहत के कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है चाहे उससे उसका खून का रिश्ता न ही हो।
अब जब ऐसे कैमिकल लोचा के शोध पत्रों का बखान पूरे विश्व में किया जा रहा है तो इस पर देवदास युगीन प्रेमियों की प्रतिक्रिया आना लाजिमी ही है। उनको इस बात पर बेहद रोष है की एक रसायन में ही उनके अमर प्रेम को समेट कर रख दिया है। आख़िर राधा और कृष्ण के प्रेम की चर्चा हमारे देश में प्राचीन कल से ही चली आ रही है तथा उन्हें एवं आधुनिक काल में जन्मे कुछ प्रेमी युगलों को आधार बनाकर प्रेम के ये पुजारी अपने निष्छल प्रेम पर एक नही बल्कि सात-सात जन्मो को न्यौछावर करने की बात करतें हैं।
इधर फटाफट मोहब्बत में सक्रिय प्रेमी युगलों पर डोपामाईन का असर कुछ ही देर तक दिखता है, जिसका प्रमाण भी मुझे अपने एक परिचित से मिला। अभी हल ही में उनको तीसरे या चौथे अमर प्रेम की प्राप्ति हुई है और शायद रसायन के प्रभाव से अपने को एक बार फिर राधा-कृष्ण, शकुंतला-दुष्यंत एवं अन्य प्रेम के पुजारियों के प्रतिरूप में स्वयं को पा रहें हैं।
अब शायद इस प्रकार के फटाफट प्रेम रोगियों के बारे में आगे कोई शोध पत्र प्रस्तुत हो तो शायद उसमे वैज्ञानिक ये कहें की इन लोगो में डोपामाईन का श्राव अत्यधिक या रुक-रुक के होता है या फिर उनके डोपामाईन के रासायनिक संगठन में कुछ कमियों को बताये जिससे उनका कैमिकल लोचा पूर्ण नही हो पाता फलस्वरूप उनके प्रेम सम्बन्ध में बिखराव आता है एवं पुनः श्राव पर एक नया प्रेम सम्बन्ध जन्म ले लेता है।
खैर सभी प्रकार के प्रेम पुजारियों की बातें तो चली आ रही हैं एवं चलती ही रहेगीं। परन्तु सबसे अहम् मुद्दा यही है की वर्तमान समय में कौन सा प्रेम अत्यधिक यथार्थपूर्ण, सम्रद्ध एवं सार्थक है - जीवन के एक बहुमूल्य उपहार के फलस्वरूप शाश्वत प्यार या दिमाग की एक उपज मात्र फटाफट मोहब्बत !