बुधवार, 21 अप्रैल 2010

अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं...

महफ़िल में कुछ परेशां से बैठे हुए जब सबकी नजरो में भी रहकर खुद को लाख छुपाने की कोशिश के बाद मिले एकांत में जब कुछ पंक्तियों को संजोया तो जो रचना बन पड़ी वो आपके सामने प्रस्तुत है....


हम आरजू के सितम से घबराने लगे हैं,
अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं|

खता थी जो बेबाक थे हर साये में,
अब तो अपने भी अंगुलियाँ उठाने लगे हैं| 

हर शख्स जो हाथों को थामे चलता था, 
अब खुद को पाने में, सबको भटकाने लगे हैं|

गुस्ताखी की जो अमन में अपनी दास्ताँ बयाँ की,
अब तो खुद हम अपना आशियाँ बचाने लगे हैं| 

खुली किताब थे जिनके सामने हर पल, 
वो भी तो अब सबको मसखरे सुनाने लगे हैं| 

कैसे करे दो बातें एहसासो की लोकेन्द्र,
अब तो चेहरे से जज्बातों की लकीरें छिपाने लगे हैं| 

सोमवार, 25 जनवरी 2010

कुछ बातें परम्परा 2010 की...

कुछ कहने से पहले मै ये बता दूँ की मै यहाँ किस परम्परा की बात कर रहा हूँ| ये परम्परा नाम है हमारे सामान्य अध्ययन की कोचिंग संस्थान ध्येय के द्वारा   बैच के ख़त्म होने पर दी जा रही एक विदाई समारोह की| इसमे एक इत्तेफाक भी जुड़ गया था की आज ६१वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या भी थी| जिसमे हमारे साथ पिछले सात महीने से पढ़ रहे सहपाठियों ने जम के भाग लिया और यहाँ तक की अपने सर लोगों को भी उन सबने खूब अपने इशारों पर नचाया या कह सकते है सर खुद ही उनके कहने पर उन्ही के अनुरूप ढले रहे| उन सबने इतने अच्छे से सब कुछ किया की एक दर्शक बन कर देखते हुए खूब मजा आया | सबका नाम न जानने के कारण मै यहाँ कुछ का नाम ही देकर उनके द्वारा किये गए अपने प्रतिभा के प्रदर्शन के प्रति कोई अपराध नही करना चाहता| लेकिन प्रोग्राम ख़त्म होने पर मुझे एक कमी सी लगने लगी थी, वो ये थी की अपने आदत के विपरीत मै पिछले सात महीनो से इन लोगो के बीच में गुमनाम सा बना रहा हूँ और आज जब मौका मिला था तो भी गुमनाम ही रहा| फिर भी सबको महसूस कर के बहुत मजा आया और उसने मुझे अतीत की ओर पहुँचा दिया था| वो अतीत जिसको अभी भी जीने का मन करता है और उसी में ही सदैव रहने का मन करता है |
आज मै अपने लखनऊ विश्वविद्यालय के जीवन की बहुत कमी महसूस कर रहा हूँ वहाँ के दोस्तों की, शुभ चिंतको की और परचितों की आज न जाने क्यों बारी-बारी सी याद एक फिल्म की भांति नजरो के सामने से गुजरी चली जा रही है| इस समय ने मुझे बहुत से अनमोल तोहफे दिए थे जो आज भी मेरे साथ हैं| जिनमे सर्वोपरि हैं वो जिन्हें सब मेरे दोस्त/मेरे भाई कहते हैं| इन्ही में से किसी ने हमारे इस छोटे से वर्ग को 
ब्राण्डेड की संज्ञा दी जो दोस्ती में एक ब्रांड है| सब हैं तो आज भी हमारे साथ और सबसे विशेष की उनमे से एक दिल्ली में भी मेरे साथ है लेकिन क्या करूँ लालची जो मै बहुत हूँ, जिस कारण मुझे सब के साथ रहने की चाह होती है| यहाँ दिल्ली में हम दोनों भाई अपने लक्ष्य को पाने में ही इतने खोये है की खुद के लिए एक तो समय नही मिलता और जो मिलता है तो ज्यादा से ज्यादा फिल्मे या खरीदारी में सीमित रह जा रहे हैं और जो इससे भी चंद लम्हें बच जाये तो थोड़ी सी मशखरी भी कर लेते हैं| फिर भी इसमे कमी तो महसूस होती है क्योंकि महफिले तो ब्राण्डेड लोगो के साथ ही जमती है|
इसी कमी को दूर करने की चाह में मै आज के कार्यक्रम में मात्र एक दर्शक की भूमिका में शामिल हुआ था| जिसमे सबने इतने अच्छे से अपने हर काम को अंजाम दिया था की मै दंग था ये देखकर की हर वो इन्सान जिसे मै रोज देखकर भी अजनबी था वो ऐसा छुपा रुस्तम निकला| जिस कारण मै अपने असहभागी रवैये पर अफसोस भी करने लगा की मै अब भी इनके बीच गुमनाम ही रहा| लेकिन फिर भी मै इन सबको यहाँ जरूर धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने आज एक उत्तेजना मेरे अन्दर भर दी है इन्हें खुद से रूबरू कराने के लिए | जिसका माध्यम आज तो न हो सका लेकिन अब आने वाला समय जरूर होगा|

सोमवार, 11 जनवरी 2010

आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा...


आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा 
जितना वहम है कोहरा उतना घना नही होगा |

सैंतालिस में फरमान जारी कर बैठे थे 
हर जन को आजादी का अहसास हुआ होगा |

आज भी भुखमरी पर बहस जारी थी 
होंठो पर हंसी, हाथों में जाम भी होगा |

उजली खादी की फिर जमघट सजी थी 
उस भूखी माँ के तन पर चिथड़ा रहा होगा |

इन्कलाब कल फिर से उठ न सकी 
सत्ता तले कोई देशभक्त कुचला गया होगा |

है जवाबदेही किसकी इन प्रश्नो की 
यार सदन में यह प्रश्न बेबुनियादी रहा होगा |

सोमवार, 23 नवंबर 2009

हकीकत में न ले चलो दोस्तों...

मुझे हकीकत में न ले चलो दोस्तों,
बस इक बार कहूँगा बेगुनाह हूँ दोस्तों|

कदम पहले बढ़ाने की कोशिश की हर सफ़र में 
ठहर गया तूफानों से रास्ते जब बदल गए दोस्तों| 

हर हाथ सहारे को बढतें रहे हर पल 
गलत थे जो उसको उधार कह गए दोस्तों|

चोट खाकर अभी संभल पाए थे नहीं 
खुद ही आँखों में आँसू देखे थे दोस्तों|

तमन्नायें देखो तो लोकेन्द्र भी रखता है 
बस आप अपनी मंजिल फ़तह करो दोस्तों|

बुधवार, 4 नवंबर 2009

ज़माना बदल गया...

एक दिन पार्क में बैठा मै किसी सोच में डूबा था| तभी वहाँ कुछ रोचक प्रसंग दिखाई पड़ा, जिसे मैंने कागज पर उतार कर उस तीर से एक और निशाना साधने की कोशिश की| जिसे मै और अच्छा कर सकता हूँ, लेकिन दिमाग के थके होने और जल्दबाजी के कारण जैसे बन पड़ी आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ| संशोधन आगे होता रहेगा......अब जरा आप गौर फरमाइएगा......


तन ढकने में 
असमर्थ कपड़ो संग 
प्रेमपाश में 
देख इक लड़की को 
बुजुर्गियत के दूत से 
आवाज आई 
ज़माना बदल गया है,


गौर फ़रमाया तब 
बोल पड़े 
बेटा तुम 
पूरे कपड़ों में 
घर से 
निकली थी 
जवाब कुछ 
उनसा ही आया 
पापा अब 
मौसम है बदल गया,


प्रेमाभिनय में 
छोड़ उन्हें 
फोन पर 
किसी से 
कहतें हैं 
डार्लिंग मत 
आना यहाँ तू 
 मजमा कुछ अब बदला है,


सबको अब 
सन्देश मिला था 
मन तो अब भी 
है वहीं 
बस तन का रंग 
जरा सा बदला है 
ज़माना तो 
देखो है वही 
बस स्वरुप 
थोडा सा बदला है !!

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

"पल-पल बढ़ती हुयी..."

एकांत में बैठा मै कुछ सोच रहा था की तभी कुछ लिखने की चाह में मैंने कलम उठा ली| फिर जो भावनाए निकली वो अब आपके सामने प्रस्तुत है.....

पल-पल बढ़ती हुई 
रिश्तों की गहराई में 
खामोश निगाहों से 
कहती थी वो
कुछ बातें, 
समझ बनी तो 
कुछ था समझा 
लफ्ज नही 
फिर भी दे पाया, 
अब चाहूँ तो 
वो दूर खड़ी है 
बन्धन में बस 
एहसासो की डोर से, 
तमन्नाओं को फिर भी 
मार रहा हूँ 
नई उमंगें 
लाने को,
फिर भी कोई 
वजह है जो 
दिल को
इंतजार रहता है |

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

"कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं..."

कुछ घटनाओं को जब मैंने कल्पना के चादर में लपेटा तो यही पंक्तियाँ बन पड़ी। जिसमे मैंने हास्य का तड़का देने का भरपूर प्रयास किया है। ये मेरा हास्य का प्रथम प्रयास अब आपके सामने प्रस्तुत है.........



आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं,
कभी थी जिन्हें हमदम बनाने की चाहत
छत पर बैठ उनकी खिड़कियों में झाँका करतें थे,
देखें कोई जब, नजरें किताबों में उतारें हम
तस्वीर उन्ही की बनाया करते थे,
हम आज भी ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं।

आखें उनसे चार हुई थी जब
वो नजरों से कुछ तीर चलाया करते थे,
दिल जब घायल हो गया मेरा
हम अहसासों के पुल बनाया करते थे,
आज भी हम ठण्डी आहें भरा करते हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करते हैं।

जब मौका मिला था मुलाकात का उनसे
उनकी सखियों के बीच हम ही शरमाया करते थे,
कॉफी हॉउस में बैठ कर हम
चाय मंगाया करते थे,
आज भी देखो हम ठण्डी आहें भरा करते हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं।

जब इकरार की बारी आई थी
छत पर गुलाब लगा हम इजहार किया करते थे,
प्रेम पत्र को, जहाज भूल हम
नाव बना कर उछाला करते थे,
नाव बिन पतवार ऐसी बहा करती थी
इजहारे मोहब्बत उनके बाप तक पहुँच जाया करती थी,
इकरार में पिटाई का पैगाम आया करता था
मोहब्बत की ताकत ने नही तब
बाहुबल मुझे बचाया करता था,
आज हम वही गलती सुधारा करतें हैं
कागज की नाव नही अब
जहाज को उछाला करतें हैं,
आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं !!

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

"मीत बना मै घूम रहा हूँ..."

अपनी पी.जी. पूरी करके पढाई के कारण लखनऊ छोड़ने के बाद एक दिन मधुशाला पढ़ते हुए, तनहाइयों में बच्चन जी की साकी, प्याला, हाला और मधुशाला को अपनी भावनाओ में डाला तो ये रचना बन पड़ी थी..... जिसे मै अपने डायरी के पन्नो से निकालकर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.....
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मीत बना मै घूम रहा हूँ
साथ लिए वीरानी को,
यादों का अवरोध लगाकर
बस यह आस लगाता हूँ !!
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काश कहीं मिल जाते अपने
मिल जाता फिर उनका साथ,
संग होते सब मित्र हमारे
साथ लिए समृद्धि को,
.
मुझे दूरी का हे मित्रो
कष्ट नही कुछ भी होता,
मिलेंगी हमको मंजिल इक दिन
तब साथ रहेगें बन हमसाया !!

रविवार, 30 अगस्त 2009

"तोहफा..."

ये रचना मैंने अपने लखनऊ विश्वविद्यालय में दोस्तों के मस्ती के साथ बीती जिंदगी के दौरान लिखी थी, जो डायरी के पन्नो में नीचे दबी पड़ी थी। आज जब नजरो के सामने मिली तो उन्ही एहसासो को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर दिया.......



वो बचपन के छूटे हुए पल
वो हंसते हुए गुजरा कल
वो खुशी से झूमते हुए पल
वो चोट खाये रोते हुए पल
वो स्कूल की यादें
वो नन्ही शरारतें
दोस्ती में देखो इनका मजा क्या है !!

वो यारों की मस्ती
वो यारों से मस्ती
बिछड़े दोस्तों की यादों की मस्ती
वो दोस्तों का साथ
वो दोस्तों के देखें हुए ख्वाब
वो टूटे हुए रिश्ते
इन रिश्तों में बीतें हुए पल
यहीं यादें हैं दोस्ती की
यही अनमोल तोहफा है जिंदगी का !!