सोमवार, 6 जून 2011

जब जरूरत थी तब नही तो.... अब कार्यवाही क्यों..?

बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए अहिंसक और शांतिपूर्ण आन्दोलन का बर्बरतापूर्वक दमन करने के पश्चात सरकार की उस कार्यवाही के समर्थन में बयानबाजी, उनके पहले से काले चहरे को और काला कर रही है| सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर पुलिसिया कार्यवाही को जायज ठहराने को लेकर उनका जो रूप उभर के सामने आ रहा है उससे साफ प्रतीत हो रहा है की वो अपने वोट बैंक को लेकर कितने संवेदनशील हैं| आज इनके इस रूप के कारण कुछ समय पहले की जनता के मध्य सबसे लोकप्रिय सरकार से जनता को जो अनुभव प्राप्त हुए हैं उससे जनता खुद को एकदम ठगी सी महसूस कर रही है|
सरकार का ये पहलकारी चेहरा वोट बैंक की राजनीति के विपरीत अगर जनता के हितो से सम्बंधित होता तो न ही उच्चतम न्यायलय से उसे इतनी फटकार सुननी पड़ती और शायद जो प्रश्न आज हर तरफ उठ रहा है की गैर राजनीतिक लोगो को ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम क्यों शुरू करना पड़ रहा है, इसकी जरूरत भी न पड़ती| कुछ समय पूर्व के संविधान विरोधी आंदोलनों के प्रति इसी सरकार की निष्ठा को सामने लाया जाये तो इनके चहरे में छिपे भाव स्पष्ट नजर आने लगेंगे| जैसा की इनका रवैया कुछ दिन पूर्व के गुज्जर और जाट आंदोलनों के प्रति थी| जिसने पूरी सुरक्षा व्यवस्था को ही नही बल्कि आम नागरिक को भी बदहाल कर दिया था| साथ ही इनके द्वारा हमारे टैक्स के बने सरकारी धन की जमकर होली भी खेली गई थी| लोग त्योहारों या किसी घरेलू कार्यक्रम में अपने घर जाने के लिए, बीमार इलाज कराने जाने के लिए, श्रमिक रोजगार पर वापस लौटने के लिए और छात्र अपने शिक्षण संस्थानों तक पहुँचने के लिए जद्दोजहद करते रहे, कुछ तो बीस की जगह पचास खर्च करके सफल हुए और कुछ थक के अपनी किस्मत को ही दोषी करार देते हुए हार मान गए| तब सरकार इतनी गहरी नींद में थी जैसे उसे कुछ आभास ही न हो| लेकिन यहाँ उनके नींद में जाने का विशेष कारण मौजूद था क्योंकि ये पूरी एक समुदाय से जुड़ा मुद्दा था जो किसी दल को अपना मत सामूहिक रूप से दे सकते थे| तो फिर सरकार उनसे कैसे बैर ले सकती थी, जिसको झेलना था वो तो झेल चुके ही हैं|
सबसे परेशान करने वाली बात ये है की सरकार का ये पहलकारी चेहरा सिर्फ उस आन्दोलन को दबाने में ही नजर आता है जो भिन्न-भिन्न समुदाय के लोगो से मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ या सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ हो, साथ ही उसका उनके वोट बैंक के खिसकने से सीधा सम्बन्ध भी हो| जैसा की एक प्रमाण है यू.पी.ए. एक की सरकार में लागू हुए उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण से उपजे आन्दोलन के खिलाफ इसमे शिरकत कर रहे देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों के छात्रो को किस तरह अनसुना करते हुए उन्हें प्रताड़ित करके भगाया गया| इसके साथ में मीडिया पर सरकार का दबाव हो या उनका स्वयं से ही सरकार के प्रति सहयोगात्मक रवैया, शायद ही लोगो के स्मृति में इसकी धुंधली छाप शेष हो और दूसरा हाल ही के अन्ना हजारे के आन्दोलन को जब उनकी आशा के विपरीत अत्यधिक सहयोग मिलने लगा तो उनका एक कुशल कूटनीतिक हल भी अब सबके समक्ष प्रस्तुत है|  लेकिन जो भी हो इस सरकार का तब से लेकर आज तक का मिजाज अपने वोट बैंक को लेकर स्थायी ही रहा है|
यहाँ सरकार को ये स्पष्ट कर लेना चाहिए था की बाबा रामदेव और रामलीला मैदान में उपस्थित पचास हजार आंदोलकारियों को शारीरिक चोट और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनसे आस लगाये बैठे करोड़ों समर्थको को मानसिक चोट पहुँचाने से पहले उनको अपनी रणनीति कहाँ पर पहलकारी करनी चाहिए थी| क्या जितनी शीघ्रता से सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ के इस आन्दोलन को गैरकानूनी घोषित कर दिया, उतनी तीव्रता से विदेशी बैंकों में जमा काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति नही घोषित कर सकती थी| सरकार को इस काले धन की प्रभाविता या उस धन के मालिको के दबाव समूह से प्रभावित हुए बिना या उनसे लाभ लिए बिना जनता के हितो और अपेक्षाओं के प्रति जवाबदेहिता के साथ कार्य करना चाहिए| साथ ही अगर अपने पहलकारी चेहरे को सर्वमान्य बनाना है तो भ्रष्टाचार के मामलों यथा टू जी स्पेक्ट्रम, सी.डब्ल्यू.जी.,  देवास, ताज कोरिडोर, खाद्यान्न घोटालों के साथ आय से अधिक संपत्ति रखने में फसें राजनेताओं और नौकरशाहों पर कार्यवाही पूर्ण करें, देश में बढ़ रही आतंकवादी घटनाओ को असफल करने में तीव्रता आये, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में बढ़ रहे  अलगाववादी तत्वों को अपना मौन समर्थन न देकर उनपर कार्यवाही सुनिश्चित करें, देश की सुरक्षा को चोटिल कर चुके आंतकवादियों को न्यायालय से मिली सजा को पूर्ण करवाएं और देश को पुनः बांटने में तुली सांप्रदायिक ताकतों पर नकेल कसने में अपने कदम अग्रसित करें| अगर इतने मुद्दों पर सरकार के ये रणनीतिकार पहलकारी होतें तो न आज इस आन्दोलन की जरुरत होती और न ही इसे दबाने के लिए उन पाँच हजार सिपाहियों की और न ही उनको अपने वोट बैंक पर खतरा मंडराता नजर आता|  
सरकार इस बात से थोडा निश्चिन्त है की जनता को उन्हें अपना प्रत्यक्ष जवाब २०१४ में देना है| इससे पूर्व जनता ने अगर उनसे जवाब माँगा तो वो क्या देंगे इसे उन्होंने दिखा दिया| लेकिन सरकार के प्रति इतना तो तय है की देर से ही सही लेकिन १२१ करोड़ की जनता के इस भारत देश में व्यस्क मताधिकार का हक़ रखने वाले उन्हें अपना जवाब जरूर देंगे की वो एक लोकतांत्रिक सरकार चाहतें हैं या..........? 

बुधवार, 22 सितंबर 2010

जीवन की मधुशाला में...

सोई-सोई यादों में 
उन सूनी-भूली बातों में 
कुछ सपने तो अब भी होगें  
उन बिखरे जज्बातों में, 

खुद को पाना 
खुद को खोना 
है ऐसा दस्तूर मेरा 
किस-किस पर इल्जाम मढूं मै 
इन भटकी सी राहों में, 

हर आँखे तकती थी रस्ता 
छाँव कहीं पाने में 
आना कैसा, जाना कैसा
उस साकी के साये में 
ये भी प्रश्न बचे होगें 
उन उलझे ख्यालों में, 

अब कैसा ये भ्रम लगा है 
सफ़र के हर प्याले में 
खुद ही अपनी हाला हूँ मै 
खुद ही हूँ पीने वाला 
हर ख्वाब हकीकत बन जायेगें 
जीवन की मधुशाला में!!

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं...

महफ़िल में कुछ परेशां से बैठे हुए जब सबकी नजरो में भी रहकर खुद को लाख छुपाने की कोशिश के बाद मिले एकांत में जब कुछ पंक्तियों को संजोया तो जो रचना बन पड़ी वो आपके सामने प्रस्तुत है....


हम आरजू के सितम से घबराने लगे हैं,
अब तो मरहम भी जख्म गहराने लगे हैं|

खता थी जो बेबाक थे हर साये में,
अब तो अपने भी अंगुलियाँ उठाने लगे हैं| 

हर शख्स जो हाथों को थामे चलता था, 
अब खुद को पाने में, सबको भटकाने लगे हैं|

गुस्ताखी की जो अमन में अपनी दास्ताँ बयाँ की,
अब तो खुद हम अपना आशियाँ बचाने लगे हैं| 

खुली किताब थे जिनके सामने हर पल, 
वो भी तो अब सबको मसखरे सुनाने लगे हैं| 

कैसे करे दो बातें एहसासो की लोकेन्द्र,
अब तो चेहरे से जज्बातों की लकीरें छिपाने लगे हैं| 

सोमवार, 25 जनवरी 2010

कुछ बातें परम्परा 2010 की...

कुछ कहने से पहले मै ये बता दूँ की मै यहाँ किस परम्परा की बात कर रहा हूँ| ये परम्परा नाम है हमारे सामान्य अध्ययन की कोचिंग संस्थान ध्येय के द्वारा   बैच के ख़त्म होने पर दी जा रही एक विदाई समारोह की| इसमे एक इत्तेफाक भी जुड़ गया था की आज ६१वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या भी थी| जिसमे हमारे साथ पिछले सात महीने से पढ़ रहे सहपाठियों ने जम के भाग लिया और यहाँ तक की अपने सर लोगों को भी उन सबने खूब अपने इशारों पर नचाया या कह सकते है सर खुद ही उनके कहने पर उन्ही के अनुरूप ढले रहे| उन सबने इतने अच्छे से सब कुछ किया की एक दर्शक बन कर देखते हुए खूब मजा आया | सबका नाम न जानने के कारण मै यहाँ कुछ का नाम ही देकर उनके द्वारा किये गए अपने प्रतिभा के प्रदर्शन के प्रति कोई अपराध नही करना चाहता| लेकिन प्रोग्राम ख़त्म होने पर मुझे एक कमी सी लगने लगी थी, वो ये थी की अपने आदत के विपरीत मै पिछले सात महीनो से इन लोगो के बीच में गुमनाम सा बना रहा हूँ और आज जब मौका मिला था तो भी गुमनाम ही रहा| फिर भी सबको महसूस कर के बहुत मजा आया और उसने मुझे अतीत की ओर पहुँचा दिया था| वो अतीत जिसको अभी भी जीने का मन करता है और उसी में ही सदैव रहने का मन करता है |
आज मै अपने लखनऊ विश्वविद्यालय के जीवन की बहुत कमी महसूस कर रहा हूँ वहाँ के दोस्तों की, शुभ चिंतको की और परचितों की आज न जाने क्यों बारी-बारी सी याद एक फिल्म की भांति नजरो के सामने से गुजरी चली जा रही है| इस समय ने मुझे बहुत से अनमोल तोहफे दिए थे जो आज भी मेरे साथ हैं| जिनमे सर्वोपरि हैं वो जिन्हें सब मेरे दोस्त/मेरे भाई कहते हैं| इन्ही में से किसी ने हमारे इस छोटे से वर्ग को 
ब्राण्डेड की संज्ञा दी जो दोस्ती में एक ब्रांड है| सब हैं तो आज भी हमारे साथ और सबसे विशेष की उनमे से एक दिल्ली में भी मेरे साथ है लेकिन क्या करूँ लालची जो मै बहुत हूँ, जिस कारण मुझे सब के साथ रहने की चाह होती है| यहाँ दिल्ली में हम दोनों भाई अपने लक्ष्य को पाने में ही इतने खोये है की खुद के लिए एक तो समय नही मिलता और जो मिलता है तो ज्यादा से ज्यादा फिल्मे या खरीदारी में सीमित रह जा रहे हैं और जो इससे भी चंद लम्हें बच जाये तो थोड़ी सी मशखरी भी कर लेते हैं| फिर भी इसमे कमी तो महसूस होती है क्योंकि महफिले तो ब्राण्डेड लोगो के साथ ही जमती है|
इसी कमी को दूर करने की चाह में मै आज के कार्यक्रम में मात्र एक दर्शक की भूमिका में शामिल हुआ था| जिसमे सबने इतने अच्छे से अपने हर काम को अंजाम दिया था की मै दंग था ये देखकर की हर वो इन्सान जिसे मै रोज देखकर भी अजनबी था वो ऐसा छुपा रुस्तम निकला| जिस कारण मै अपने असहभागी रवैये पर अफसोस भी करने लगा की मै अब भी इनके बीच गुमनाम ही रहा| लेकिन फिर भी मै इन सबको यहाँ जरूर धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने आज एक उत्तेजना मेरे अन्दर भर दी है इन्हें खुद से रूबरू कराने के लिए | जिसका माध्यम आज तो न हो सका लेकिन अब आने वाला समय जरूर होगा|

सोमवार, 11 जनवरी 2010

आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा...


आँखों पर जोर डालो तो रास्ता दिखेगा 
जितना वहम है कोहरा उतना घना नही होगा |

सैंतालिस में फरमान जारी कर बैठे थे 
हर जन को आजादी का अहसास हुआ होगा |

आज भी भुखमरी पर बहस जारी थी 
होंठो पर हंसी, हाथों में जाम भी होगा |

उजली खादी की फिर जमघट सजी थी 
उस भूखी माँ के तन पर चिथड़ा रहा होगा |

इन्कलाब कल फिर से उठ न सकी 
सत्ता तले कोई देशभक्त कुचला गया होगा |

है जवाबदेही किसकी इन प्रश्नो की 
यार सदन में यह प्रश्न बेबुनियादी रहा होगा |

सोमवार, 23 नवंबर 2009

हकीकत में न ले चलो दोस्तों...

मुझे हकीकत में न ले चलो दोस्तों,
बस इक बार कहूँगा बेगुनाह हूँ दोस्तों|

कदम पहले बढ़ाने की कोशिश की हर सफ़र में 
ठहर गया तूफानों से रास्ते जब बदल गए दोस्तों| 

हर हाथ सहारे को बढतें रहे हर पल 
गलत थे जो उसको उधार कह गए दोस्तों|

चोट खाकर अभी संभल पाए थे नहीं 
खुद ही आँखों में आँसू देखे थे दोस्तों|

तमन्नायें देखो तो लोकेन्द्र भी रखता है 
बस आप अपनी मंजिल फ़तह करो दोस्तों|

बुधवार, 4 नवंबर 2009

ज़माना बदल गया...

एक दिन पार्क में बैठा मै किसी सोच में डूबा था| तभी वहाँ कुछ रोचक प्रसंग दिखाई पड़ा, जिसे मैंने कागज पर उतार कर उस तीर से एक और निशाना साधने की कोशिश की| जिसे मै और अच्छा कर सकता हूँ, लेकिन दिमाग के थके होने और जल्दबाजी के कारण जैसे बन पड़ी आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ| संशोधन आगे होता रहेगा......अब जरा आप गौर फरमाइएगा......


तन ढकने में 
असमर्थ कपड़ो संग 
प्रेमपाश में 
देख इक लड़की को 
बुजुर्गियत के दूत से 
आवाज आई 
ज़माना बदल गया है,


गौर फ़रमाया तब 
बोल पड़े 
बेटा तुम 
पूरे कपड़ों में 
घर से 
निकली थी 
जवाब कुछ 
उनसा ही आया 
पापा अब 
मौसम है बदल गया,


प्रेमाभिनय में 
छोड़ उन्हें 
फोन पर 
किसी से 
कहतें हैं 
डार्लिंग मत 
आना यहाँ तू 
 मजमा कुछ अब बदला है,


सबको अब 
सन्देश मिला था 
मन तो अब भी 
है वहीं 
बस तन का रंग 
जरा सा बदला है 
ज़माना तो 
देखो है वही 
बस स्वरुप 
थोडा सा बदला है !!

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

"पल-पल बढ़ती हुयी..."

एकांत में बैठा मै कुछ सोच रहा था की तभी कुछ लिखने की चाह में मैंने कलम उठा ली| फिर जो भावनाए निकली वो अब आपके सामने प्रस्तुत है.....

पल-पल बढ़ती हुई 
रिश्तों की गहराई में 
खामोश निगाहों से 
कहती थी वो
कुछ बातें, 
समझ बनी तो 
कुछ था समझा 
लफ्ज नही 
फिर भी दे पाया, 
अब चाहूँ तो 
वो दूर खड़ी है 
बन्धन में बस 
एहसासो की डोर से, 
तमन्नाओं को फिर भी 
मार रहा हूँ 
नई उमंगें 
लाने को,
फिर भी कोई 
वजह है जो 
दिल को
इंतजार रहता है |

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

"कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं..."

कुछ घटनाओं को जब मैंने कल्पना के चादर में लपेटा तो यही पंक्तियाँ बन पड़ी। जिसमे मैंने हास्य का तड़का देने का भरपूर प्रयास किया है। ये मेरा हास्य का प्रथम प्रयास अब आपके सामने प्रस्तुत है.........



आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं,
कभी थी जिन्हें हमदम बनाने की चाहत
छत पर बैठ उनकी खिड़कियों में झाँका करतें थे,
देखें कोई जब, नजरें किताबों में उतारें हम
तस्वीर उन्ही की बनाया करते थे,
हम आज भी ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं।

आखें उनसे चार हुई थी जब
वो नजरों से कुछ तीर चलाया करते थे,
दिल जब घायल हो गया मेरा
हम अहसासों के पुल बनाया करते थे,
आज भी हम ठण्डी आहें भरा करते हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करते हैं।

जब मौका मिला था मुलाकात का उनसे
उनकी सखियों के बीच हम ही शरमाया करते थे,
कॉफी हॉउस में बैठ कर हम
चाय मंगाया करते थे,
आज भी देखो हम ठण्डी आहें भरा करते हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं।

जब इकरार की बारी आई थी
छत पर गुलाब लगा हम इजहार किया करते थे,
प्रेम पत्र को, जहाज भूल हम
नाव बना कर उछाला करते थे,
नाव बिन पतवार ऐसी बहा करती थी
इजहारे मोहब्बत उनके बाप तक पहुँच जाया करती थी,
इकरार में पिटाई का पैगाम आया करता था
मोहब्बत की ताकत ने नही तब
बाहुबल मुझे बचाया करता था,
आज हम वही गलती सुधारा करतें हैं
कागज की नाव नही अब
जहाज को उछाला करतें हैं,
आज भी हम ठण्डी आहें भरा करतें हैं
कागज के जहाज अक्सर उछाला करतें हैं !!