रविवार, 10 नवंबर 2013

सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दल...

राजनीतिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की प्रबलता उच्चतम न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले से मिलती है जिसमे वोटरों को जानकारी प्राप्त करने को संविधान के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा गया कि कोई भी वोटर लोकतंत्र में अपने मौलिक अधिकार को तब तक प्राप्त करने में असमर्थ है, जब तक उसे तथ्यो की पूर्ण जानकारी न हो। साथ ही अपने एक अन्य फैसले में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भारत की जनता को चुनावो के दौरान राजनीतिक दलो के खर्च का स्रोत पता होना चाहिये।
आज हम एक अरब से अधिक नागरिकों से परस्पर सम्बद्ध राष्ट्र के रूप में निरंतर विकसित हो रहे है। इसके बावजूद भी जनता के एक बड़े वर्ग में चुनाव के प्रति उदासीनता व्याप्त है, जिसमे देश का बौद्धिक वर्ग भी  शामिल है और आजादी के ६६ साल बाद भी आम चुनावो में वोटरो की भागीदारी अभी भी संतोषजनक स्थिति तक नहीं पहुँच पाई है। जिसका मुख्य कारण रहा है कि भ्रष्टाचार भले ही राजनीतिक मुद्दा बन रहा हो लेकिन देश की राजनीतिक संस्कृति इस तरह कि है कि जनता किसी को पाक साफ़ मानने को तैयार ही नहीं है। लोग किसी योग्य को चुनने के बजाये अयोग्यों की भीड़ से उनको चुन रहे हैं जो स्वयं की स्वार्थसिद्धि में अन्यो की तुलना में कम अहित करें।इसी चुनावी उदासीनता को दूर करने के लिए चुनाव सुधार की दौड़ में राजनितिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना एक बेहतरीन पहल होगी। 
भारत के कई चिंतको ने वर्त्तमान चुनाव प्रणाली को भ्रष्टाचार की जननी और काले धन का मुक्ति द्वार कहा है। इन्ही मंहगे चुनाव लड़कर सत्ता में आने वाले राजनीतिज्ञो की प्राथमिकता किसी भी तरह से अपने खर्चे कि पूर्ति करना और आने वाले चुनावो के लिए धन संग्रह करना होता है। परिणामस्वरूप सार्वजनिक पदो पर मौजूद भ्रष्टाचार की शुरुआत चुनाव के साथ ही हो जाती है जिसमे राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता के लोभ में करोड़ो रूपये उड़ा देती है और उसके स्रोत की कोई जानकारी जनता को प्राप्त नही होती है। राजनीतिक दल इसे चंदे से प्राप्त धन बताते है तो कुछ चिंतक इसे  काळे धन का ही हिस्सा बताते है। फिर भी अगर इसमे से कुछ हिस्सा कार्पोरेट घरानो से मिले चंदे का ही है तो ये सरकारी नीतियों पर किस प्रकार हावी होते है इसका उदहारण 2जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट जैसे मुद्दो में हुए पक्षपात और अन्यो कि अनदेखी से साफ़ स्पष्ट है। साथ ही उस समय इन राजनीतिक दलो की  मंशा और जाहिर हो जाती है जब किसी नीति के सन्दर्भ में ये दिखता है कि कुछ कार्पोरेट घरानो के लोग अपने हिसाब से सरकारी नीति का निर्माण करवाने में सफल हो जाते है जबकि जब देश के किसान व आदिवासी अपने हक़ की मांग करते है व हालही में राजनीतिक भ्रष्टाचार का सबसे ताजा उदहारण कि जब पूरा देश सड़को पर भ्रष्टाचार के खिलाफ उतर कर लोकपाल की मांग कर रहा था तो उन्हें छलावा छोड़कर कुछ हासिल न हुआ। 
इसी खतरे के प्रति आगाह करते हुए १४-१५ अगस्त १९४७ की रात भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने संविधान सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि "जब तक उच्च पदो पर हम भ्रष्टाचार ख़त्म नही करते, हर रूप में भाई-भतीजावाद, सत्तालोभ, मुनाफाखोरी, और कालाबाजारी रोकने में कामयाब नही हो पाते तब तक हम प्रशासन और आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन और वितरण में कुशलता नहीं ला पायेगें।" भारत के विधि आयोग ने भी अपनी १७०वीं रिपोर्ट में राजनितिक दलो की कार्यपद्धति में सुधार पर जोर देते हुए कहा कि "राजनीतिक दल ही सरकार बनाते है, संसद चलाते है, और देश का शासन चलाते है। अतः ये आवश्यक है कि राजनीतिक दलो में आतंरिक लोकतंत्र, वित्तीय पारदर्शिता और उनके काम में जवाबदेहिता लागू की जाये। जो राजनीतिक दल अपनी आतंरिक कार्यपद्धति में लोकतान्त्रिक सिद्धांतो का सम्मान नही करता, उससे देश के शासन में इन सिद्धांतो के सम्मान की आशा नही की जा सकती है।" उक्त बातो के सन्दर्भ में आवश्यक था की भारत में चुनाव सुधार के प्रयास युद्ध स्तर पर किये जाने चाहिए थे खासतौर पर राजनीतिक दलो के वित्तीय सुधार के विषय में। लेकिन अफसोस की इस विषय पर अब तक की बनी सभी सरकारों में निराशा ही व्याप्त रही। 
इसी सन्दर्भ में जब केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक पारदर्शिता लाने के लिहाज से स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के तहत जवाबदेह है। तो इस फैसले का देश के एक बड़े बौद्धिक वर्ग द्वारा स्वागत किया गया। मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्र और सूचना आयुक्त एम. एल. शर्मा तथा अन्नपूर्णा दीक्षित की पीठ ने कहा कि विशेषकर ६ दल- काँग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, राकांपा और बसपा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकार के मानदंड को पूरा करते है। क्योकि इन्हे करो में छूट, सस्ते दरो पर जमीने व सरकारी आवास की उपलब्धता, आकाशवाणी व दूरदर्शन द्वारा किया गया मुफ्त प्रसारण अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त सरकारी सहायता ही है। साथ ही ये राजनितिक दल नागरिको के जीवन को प्रभावित करते है और गैर सरकारी होने के बावजूद भी सार्वजनिक कामों में शामिल रहते हुए प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सरकारी नीतियों को भी प्रभावित करते है। इसलिये  महत्वपूर्ण है कि वो जनता के प्रति जवाबदेह हो।  
केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले पर राजनीतिक दलो की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए ये हास्यपद लगता है कि जहाँ देश के अन्य सभी अंगो के लिए पारदर्शिता अच्छी है वहीं इन राजनितिक दलो के लिए ये ठीक नही जो वास्तव में देश के समस्त महत्वपूर्ण अंगो पर नियंत्रण रखते है। सूचना के अधिकार की क्रांति को देखते हुए, अपने सीमित क्षमताओं के बावजूद भी राजनीतिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने वाला यह अधिनियम राजनीतिक जवाबदेहिता और पारदर्शिता लाने के लिये मील का पत्थर साबित हो सकती है। इसके बावजूद भी देश को अभी इस अधिनियम के विस्तार के साथ-साथ अन्य चुनाव सुधार भी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते जा रहे हैं। 

                                                                                                                                                                                                                               
                                                                                       
                                                                                            (गुरू जी की प्रेरणा से)
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