गुरुवार, 16 जनवरी 2014

जो मेरा फरिश्ता है उसे खुदा मान ले कैसे...

है इक जज्बा इश्क़ 
तो उसे इत्तेफाक मान ले कैसे,
उनकी सोख अदाओं को 
मोहब्बत की बुनियाद मान ले कैसे, 

करते रहे गुज़ारिश 
हर पल 
हर क्षण 
हर इंतज़ार की खातिर 
जो लमहो में बीता हो 
उसे सदी मान ले कैसे, 

वो आरजू 
वो सितम 
वो कशिश 
जो थी रूपहले पर्दे पर 
वो कल था 
उसे आज मान ले कैसे,

इक जुनून को भर के 
लहरों की तरह बहते हुए 
दीवानगी के साथ 
बेताबियों के बवण्डर में 
हैरानियों को संजो कर 
जो ख्वाब हैं 
उसे नींद मान ले कैसे, 

कुछ तमन्नाओं का जज्बा 
कुछ जीवन की उलझी हुई पहेली 
कुछ मेरी अनकही बातें 
कुछ उनकी न सुनने की आदत 
फिर भी निश्छल अनंत की 
जिस गहराई में डूबे हैं 
उसे समंदर मान ले कैसे, 

संवेदनओं के संसार में 
अभिव्यक्ति की इक दौड़ है 
भावनाओं के महासमर में 
एहसासों का पतझड़ 
है जो भी ये इश्क़ 
रिवायत या रूहानियत 
जो मेरा फरिश्ता है 
उसे खुदा मान ले कैसे..! 

रविवार, 10 नवंबर 2013

सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दल...

राजनीतिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की प्रबलता उच्चतम न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले से मिलती है जिसमे वोटरों को जानकारी प्राप्त करने को संविधान के अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए कहा गया कि कोई भी वोटर लोकतंत्र में अपने मौलिक अधिकार को तब तक प्राप्त करने में असमर्थ है, जब तक उसे तथ्यो की पूर्ण जानकारी न हो। साथ ही अपने एक अन्य फैसले में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भारत की जनता को चुनावो के दौरान राजनीतिक दलो के खर्च का स्रोत पता होना चाहिये।
आज हम एक अरब से अधिक नागरिकों से परस्पर सम्बद्ध राष्ट्र के रूप में निरंतर विकसित हो रहे है। इसके बावजूद भी जनता के एक बड़े वर्ग में चुनाव के प्रति उदासीनता व्याप्त है, जिसमे देश का बौद्धिक वर्ग भी  शामिल है और आजादी के ६६ साल बाद भी आम चुनावो में वोटरो की भागीदारी अभी भी संतोषजनक स्थिति तक नहीं पहुँच पाई है। जिसका मुख्य कारण रहा है कि भ्रष्टाचार भले ही राजनीतिक मुद्दा बन रहा हो लेकिन देश की राजनीतिक संस्कृति इस तरह कि है कि जनता किसी को पाक साफ़ मानने को तैयार ही नहीं है। लोग किसी योग्य को चुनने के बजाये अयोग्यों की भीड़ से उनको चुन रहे हैं जो स्वयं की स्वार्थसिद्धि में अन्यो की तुलना में कम अहित करें।इसी चुनावी उदासीनता को दूर करने के लिए चुनाव सुधार की दौड़ में राजनितिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाना एक बेहतरीन पहल होगी। 
भारत के कई चिंतको ने वर्त्तमान चुनाव प्रणाली को भ्रष्टाचार की जननी और काले धन का मुक्ति द्वार कहा है। इन्ही मंहगे चुनाव लड़कर सत्ता में आने वाले राजनीतिज्ञो की प्राथमिकता किसी भी तरह से अपने खर्चे कि पूर्ति करना और आने वाले चुनावो के लिए धन संग्रह करना होता है। परिणामस्वरूप सार्वजनिक पदो पर मौजूद भ्रष्टाचार की शुरुआत चुनाव के साथ ही हो जाती है जिसमे राजनीतिक पार्टियाँ सत्ता के लोभ में करोड़ो रूपये उड़ा देती है और उसके स्रोत की कोई जानकारी जनता को प्राप्त नही होती है। राजनीतिक दल इसे चंदे से प्राप्त धन बताते है तो कुछ चिंतक इसे  काळे धन का ही हिस्सा बताते है। फिर भी अगर इसमे से कुछ हिस्सा कार्पोरेट घरानो से मिले चंदे का ही है तो ये सरकारी नीतियों पर किस प्रकार हावी होते है इसका उदहारण 2जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट जैसे मुद्दो में हुए पक्षपात और अन्यो कि अनदेखी से साफ़ स्पष्ट है। साथ ही उस समय इन राजनीतिक दलो की  मंशा और जाहिर हो जाती है जब किसी नीति के सन्दर्भ में ये दिखता है कि कुछ कार्पोरेट घरानो के लोग अपने हिसाब से सरकारी नीति का निर्माण करवाने में सफल हो जाते है जबकि जब देश के किसान व आदिवासी अपने हक़ की मांग करते है व हालही में राजनीतिक भ्रष्टाचार का सबसे ताजा उदहारण कि जब पूरा देश सड़को पर भ्रष्टाचार के खिलाफ उतर कर लोकपाल की मांग कर रहा था तो उन्हें छलावा छोड़कर कुछ हासिल न हुआ। 
इसी खतरे के प्रति आगाह करते हुए १४-१५ अगस्त १९४७ की रात भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने संविधान सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था कि "जब तक उच्च पदो पर हम भ्रष्टाचार ख़त्म नही करते, हर रूप में भाई-भतीजावाद, सत्तालोभ, मुनाफाखोरी, और कालाबाजारी रोकने में कामयाब नही हो पाते तब तक हम प्रशासन और आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन और वितरण में कुशलता नहीं ला पायेगें।" भारत के विधि आयोग ने भी अपनी १७०वीं रिपोर्ट में राजनितिक दलो की कार्यपद्धति में सुधार पर जोर देते हुए कहा कि "राजनीतिक दल ही सरकार बनाते है, संसद चलाते है, और देश का शासन चलाते है। अतः ये आवश्यक है कि राजनीतिक दलो में आतंरिक लोकतंत्र, वित्तीय पारदर्शिता और उनके काम में जवाबदेहिता लागू की जाये। जो राजनीतिक दल अपनी आतंरिक कार्यपद्धति में लोकतान्त्रिक सिद्धांतो का सम्मान नही करता, उससे देश के शासन में इन सिद्धांतो के सम्मान की आशा नही की जा सकती है।" उक्त बातो के सन्दर्भ में आवश्यक था की भारत में चुनाव सुधार के प्रयास युद्ध स्तर पर किये जाने चाहिए थे खासतौर पर राजनीतिक दलो के वित्तीय सुधार के विषय में। लेकिन अफसोस की इस विषय पर अब तक की बनी सभी सरकारों में निराशा ही व्याप्त रही। 
इसी सन्दर्भ में जब केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक पारदर्शिता लाने के लिहाज से स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल सूचना के अधिकार के तहत जवाबदेह है। तो इस फैसले का देश के एक बड़े बौद्धिक वर्ग द्वारा स्वागत किया गया। मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्र और सूचना आयुक्त एम. एल. शर्मा तथा अन्नपूर्णा दीक्षित की पीठ ने कहा कि विशेषकर ६ दल- काँग्रेस, भाजपा, भाकपा, माकपा, राकांपा और बसपा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक प्राधिकार के मानदंड को पूरा करते है। क्योकि इन्हे करो में छूट, सस्ते दरो पर जमीने व सरकारी आवास की उपलब्धता, आकाशवाणी व दूरदर्शन द्वारा किया गया मुफ्त प्रसारण अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त सरकारी सहायता ही है। साथ ही ये राजनितिक दल नागरिको के जीवन को प्रभावित करते है और गैर सरकारी होने के बावजूद भी सार्वजनिक कामों में शामिल रहते हुए प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सरकारी नीतियों को भी प्रभावित करते है। इसलिये  महत्वपूर्ण है कि वो जनता के प्रति जवाबदेह हो।  
केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले पर राजनीतिक दलो की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए ये हास्यपद लगता है कि जहाँ देश के अन्य सभी अंगो के लिए पारदर्शिता अच्छी है वहीं इन राजनितिक दलो के लिए ये ठीक नही जो वास्तव में देश के समस्त महत्वपूर्ण अंगो पर नियंत्रण रखते है। सूचना के अधिकार की क्रांति को देखते हुए, अपने सीमित क्षमताओं के बावजूद भी राजनीतिक दलो को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने वाला यह अधिनियम राजनीतिक जवाबदेहिता और पारदर्शिता लाने के लिये मील का पत्थर साबित हो सकती है। इसके बावजूद भी देश को अभी इस अधिनियम के विस्तार के साथ-साथ अन्य चुनाव सुधार भी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते जा रहे हैं। 

                                                                                                                                                                                                                               
                                                                                       
                                                                                            (गुरू जी की प्रेरणा से)

सोमवार, 22 जुलाई 2013

आरक्षण न दिया जाये ये अन्याय होगा, लेकिन आरक्षण सही व्यक्ति को मिले तभी न्याय होगा …

आधुनिकता के इस  दौर में तेजी से भागती दुनिया में भारत जैसे विकासशील देश के ऐतिहासिक कारणों से शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े व आशक्तों को अवसर की उपलब्धता हेतु आरक्षण पाना उनका नैतिक अधिकार है। जिससे वो भी अपनी प्रतिष्ठा स्थापित कर देश की प्रगति का हिस्सा बन सके। विकास के दौड़ में आर्थिक व शैक्षिक अवसरों के कुछ वर्गो में संकेन्द्रण  की अधिकता को खत्म करके अवसर के लाभ को सभी तक पहुँचाने के लिए शुरू की गई यह नीति उस वक़्त अपनी प्रासंगिकता से विमुख होने लगती है जब इसमे फिर से आरक्षण के फलस्वरूप मिले अवसर की संकेंद्रता पुन: कुछ इन्ही पिछड़ी जातियों के आर्थिक रूप से उच्च वर्ग में बढ़ जाती है।
अभी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अपनाये गए आरक्षण नीति का जब व्यापक रूप से विरोध शुरू हुआ तो इस मुद्दे का राजनीतिकरण करते हुए इसे सामान्य वर्ग बनाम आरक्षित वर्ग करके दंगे की स्थिति उत्पन्न कर दी गई। जबकि अगर ध्यान से देखिये तो वर्तमान की आरक्षण नीति इसी आरक्षित वर्ग के गरीबो के साथ अन्याय और अवसर को छीनने वाला है। उदाहरणस्वरुप अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर के आय का दायरा बढ़ा के, जबकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति व महिला आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था न होने से वास्तविक रूप से आरक्षण का लाभ पाने का नैतिक हक रखने वाले व्यक्तियों की अपेक्षाओं के साथ मजाक किया जा रहा है।
अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर के आय का दायरा 6.5 लाख रुपये वार्षिक (लगभग 54 हजार रुपये मासिक) कर दिया गया, जबकि एक आँकड़े के अनुसार देश की लगभग 40 करोड़ जनता प्रतिदिन 20 रुपये से कम पर गुजारा करती है। वहाँ क्रीमी लेयर के आय का दायरा इतना अधिक बढ़ा कर इन नीतिकर्ताओं द्वारा आरक्षण का लाभ किसे पहुँचाने की कोशिश की जा रही है और इसके पीछे इनकी मंशा व नीयत क्या है यह साफ जाहिर हो रहा है। साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति व महिला आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था न होने से इस वर्ग में भी आरक्षण का लाभ अधिकतर वही उठा रहे है जिनको इसे पाने का अब कोई नैतिक अधिकार नही रहा।
आरक्षण के वर्तमान स्वरुप को ध्यान से देखिये तो आरक्षण लागू होने से पहले जो आय के अवसर का चक्र उच्च जातियों के बीच घूमता था। अब उस चक्र में बस वो शामिल हो गये है जिन्हें शुरूआती दौर में आरक्षण का लाभ मिल चुका है और अब वे आर्थिक रूप से सक्षम और सशक्त है। अब फिर अगर देखिये तो अवसर का चक्र इन्ही उच्च वर्ग के ही इर्द-गिर्द सीमित है, जबकि गरीब फिर इससे बाहर है। अगर वास्तव में इस आरक्षण नीति को इसके असली हक़दार तक पहुँचाना व इसे प्रासंगिक बनाना है तो अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर का दायरा बढ़ाने के बजाये उसे सीमित करना होगा और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति व महिला आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था को लागू करना होगा। फिर अगर इससे भी आरक्षण की नीति को न्याय होता न दिखे तो जाति के स्थान पर आय के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करनी होगी। इस स्थिति में भारत जैसे बहुजाति वाले देश में सिर्फ दो वर्ग बचेंगे, एक आर्थिक रूप से सम्पन्न और दूसरा गरीब। इस आधार पर यहाँ जो जातियों में वैमनस्यता व्याप्त है वो तो बहुत हद तक सीमित होगी ही बल्कि सरकार द्वारा चलायी जा रही विकास योजनाओं में जातियों के आधार पर गरीबो के साथ जो उपेक्षा हो रही है उसे भी नियंत्रित कर उसका सही से क्रियान्वयन किया जा सकेगा।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

प्यार न हुआ तुम्हारा यू .पी .एस .सी . का एग्जाम हो गया है, दस साल से क्लीयर ही नही हो रहा...

किसी ने हमसे कहा था की रांझणा मूवी मत देखना, पचा नही पाओगे ठाकुर! पर क्या करते जब हमीं को चूतियापा सूझा था, एक तो लोग हम पर ही फिल्म का डॉयलॉग मार के हम ही को फिल्म न देखने को बोल रहे थे, जो की मुश्किल ही नही नामुमकिन भी था साहब। खैर फिल्म पर लौटते हैं वो मुरारी क्या बोला था फिल्म में की प्यार न हुआ तुम्हारा यू .पी .एस .सी . का एग्जाम हो गया है, दस साल से क्लीयर ही नही हो रहा। तो अब हम अपनी सुनाते है, प्यार के बारे में नही अपने बारे मे……  की आज दस साल हो गये बोले हुए फिर भी एग्जाम क्लीयर ही न हो पाया।
ये दस साल तब शुरू हुआ था जब 2003 में पापा की चाहत के बावजूद लॉ ऑनर्स की काउंसिलिंग छोड़ हमने B.A. में एडमिशन ले लिया जिसे लोग सिंपल ग्रेजुएशन बोलते हैं। हलांकि ये किस्मत का ही खेल था की इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के बावजूद भी ग्रेजुएट हम लखनऊ यूनिवर्सिटी से ही हो पाये। अब जबकि मै छात्र नेताओ के विश्वविद्यालय का था, तो उनकी रंगत तो आनी तय ही थी। जिसकी पूर्ण झलक तब दिखी जब वहां किसी ने एक बार हमसे पूछा की बड़े होकर क्या बनोगे? वक़्त भी ऐसा था की हम कैंटीन में हॉफ पैंट में ही खड़े चाय पी रहे थे, उनका ये सवाल सुन के मन तो किया पूरी चाय उनके अन्दर ही धकेल दूँ लेकिन खुद को काबू में कर बड़ी मासूमियत से जवाब दिए की अब कक्षा पहन के खड़े हैं तो इसका ये मतलब नही की हम अभी बढ़े नही, अब चूँकि हम बड़े हो चुके हैं तो आगे की भी पटकथा सुनाते हैं,"सरकार चलाना है हमे।"
खैर चलाना है ये तो पक्का है लेकिन कैसे और उसका रूप क्या होगा, उसे सोचना बाकी था, एक तरीका जो पिता जी की चाहत भी थी न्यायपालिका के रूप में उसे तो पहले ही नाता तोड़ चुके थे तो अब दूसरी राह पकड़ ली। जिसे लोग विधायिका या राजनीति बोलते है, लेकिन हम उसे नेतागिरी से ज्यादा न समझ पाये। शुरुआत अच्छी रही और जल्दी ही जिन्दाबाद -मुर्दाबाद भी होने लगा। लेकिन साहब इसमे 5 साल लग गए और इस दौरान हमने ऊचाईयाँ भी चढ़ी, जिंदगी के साथ खूब कबड्डी खेली और जिंदगी को भी जब मौका मिला उसने भी हमसे खूब कत्थक कराया। खैर अब 2007-08 का समय आ गया था और हम पोस्ट ग्रेजुएट होने वाले थे इसी दौरान स्टूडेंट पॉलिटिक्स पर सरकार की नई नीति ने हमे वहाँ से भी दूर कर दिया। तो अब मेरे पास दो ही रास्ते बचे थे की इसी जिंदगी के जिंदाबाद-मुर्दाबाद में अपना सिर पटकूं या कोई और राह पकड़ कर जल्दी अपनी मंजिल पर पहुंचू क्योकि उस समय भी राजनीति में जिसका राज था उसी की नीति भी थी। तो अपना राज बनाने की कठिन नीति पर चलने के बजाये हमने आसान राह पकड़ी।
चूँकि मुझे हमेशा से ऐसे भाइयों का साथ था जिनके कारण मै पढाई से भागने के बावजूद भी उससे दूर न हो पाया था। तो मै उन्ही के साथ सापेक्षत: आसान काम IAS बनने में जुट गया और लखनऊ से दिल्ली वाया इलाहबाद पहुँच कर जो सफ़र शुरू किया, उसकी शुरुआत संतोषजनक रही। लेकिन जल्द ही वास्तविकता से परिचय हुआ जब 2010 में दिए अपने पहले एटेम्पट में असफलता से रूबरू होना पड़ा और जब उससे उबर कर 2011 में मजबूती से जवाब देना चाहा तो किस्मत का खेल देखिये की एग्जाम से एक रात पहले हम हॉस्पिटल पहुँच चुके थे और सुबह लाख कोशिश और हिम्मत करने के बावजूद डॉक्टर यही बोले की छोड़ दो बेटा तुमसे न हो पायेगा।
अब चूँकि किस्मत का खेल हम पर हावी हो चुका था फिर भी हम हार मानाने वाले कहा थे, जब यही ठान चुके थे की सरकार ही चलाना है। तो एक साल फिर से इंतजार करने के बजाये हम पहुँच गये भोपाल, जर्नलिस्ट बनने। सोचा था ज्यादा समय IAS बनने में देंगे और जो समय बचेगा उसमे जर्नलिस्ट बन लेंगे। लेकिन कुछ ही समय में हमे ये समझ आ गया की ठाकुर सिर्फ कलम चला लेने के कौशल से ही जर्नलिस्ट नही बन सकते, उसके लिए कुछ और भी करना पड़ेगा। अब मेरे पास उस कुछ और के लिए तो समय था नही तो भय्या अपने लौटे आत्मविश्वास के साथ हम फिर सापेक्षतः उसी आसान काम को पूरा करने के लिए दिल्ली लौट आये जो की था पढाई करना। अब ये आसान  काम अगर ईमानदारी से हो गया तो वो ये जरुर कहेंगे जिन्होंने 10 साल पहले गलती से कभी मेरी पढाई की शैली देख ये कयास लगा कर कहा था की ये लड़का जरुर IAS बनेगा, लेकिन क्लीयर अब कर पाया है…

मंगलवार, 9 जुलाई 2013

लगाये जो शज़र हमने...

लगाये जो शज़र हमने वो अक्सर सूख जाते हैं,
जहाँ मैने मोहब्बत की शहर वो छूट जाते हैं।

बिना मक़सद कहें कुछ भी, बिना अल्फ़ाज के यूँ ही,
वही होते हैं अपने जो अक्सर रुठ जाते हैं।

खुदी से बुलंद होकर धरा के आगोश में लौटा,
जिससे उम्मीद की मैने वो माँझी डूब जाते हैं।

ख्वाहिशों की उड़ानो में मिले रुसवाईयाँ जब भी,
वही रिश्तो के कच्चे धागे अक्सर टूट जाते हैं।

उनकी आँखो की उऴफत में सितम कुछ इस कदर खाये,
मेरी दस्तक भी सुन के वो दरवाजा खोलना भूल जाते हैं।


[शज़र=वृक्ष, माँझी=नाविक]

हर आहट पर कान लगाये बैठा रहा कोई, 
की इक दस्तक हो और तू आये...

तू ही उसका हकदार है...

तू साथी,
तू हमसफर,
तू ही तो दिलदार है,
हर महफिल में
हम हँस सके
तू ही उसका हकदार है।

कुछ वहम
ऐसा हुआ
कि सिसकियाँ
थी बँधी,
अब चला है
तू तो देखो
साथ हम
बढ़ने लगे।

है जो तेरा
साथ जो
फिर किसी का
डर नही,
है जो तू मेरे
पास तो
फिर किसी का
गम नही,
है जो तू मेरा
यार तो
फिर सफर
होगा हंसी,
हैं हम जो
साथ तो
कुछ भी
कर देगेँ कभी।

तू साथी,
तू हमसफर,
तू ही तो दिलदार है,
हर महफिल में
हम हँस सके
तू ही उसका हकदार है।

ये युवा की हुंकार है...

बन रहा है रास्ता
तो बिछ रही बिसात है,
लड़ते, गिरते देख तो
जीत की मिठास है,

कुछ चले थे वो कभी
कुछ चले हैं आज भी,
देख अब युवा तुझे
देश की पुकार है,

कदम बढ़ा के रख दिया
जोश का उबाल है,
है कौन जो डिगा सके
किसकी ये मजाल है,

बिना रुके, बिना डरे,
बिना थके, तू चलता चल
है कौन जो झुका नही
ये युवा की हुंकार है...

ख्वाबो में तुम आते रहे...

ख्वाबो में तुम आते रहे,
यादों में तुम आते रहे,
मुड़ कर कभी देखा नही
हकीकत में जब तुम जाते रहे।

करते रहे बाते सभी
लोगो को हम भटकाते रहे,
करने को थी बाते बहुत
पर खुद में तुम इतराते रहे।