अपनी पी.जी. पूरी करके पढाई के कारण लखनऊ छोड़ने के बाद एक दिन मधुशाला पढ़ते हुए, तनहाइयों में बच्चन जी की साकी, प्याला, हाला और मधुशाला को अपनी भावनाओ में डाला तो ये रचना बन पड़ी थी..... जिसे मै अपने डायरी के पन्नो से निकालकर आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ.....
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मीत बना मै घूम रहा हूँ
साथ लिए वीरानी को,
यादों का अवरोध लगाकर
बस यह आस लगाता हूँ !!
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काश कहीं मिल जाते अपने
मिल जाता फिर उनका साथ,
संग होते सब मित्र हमारे
साथ लिए समृद्धि को,
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मुझे दूरी का हे मित्रो
कष्ट नही कुछ भी होता,
मिलेंगी हमको मंजिल इक दिन
तब साथ रहेगें बन हमसाया !!






