मंगलवार, 9 जुलाई 2013
ख्वाबो में तुम आते रहे...
ख्वाबो में तुम आते रहे,
यादों में तुम आते रहे,
मुड़ कर कभी देखा नही
हकीकत में जब तुम जाते रहे।
करते रहे बाते सभी
लोगो को हम भटकाते रहे,
करने को थी बाते बहुत
पर खुद में तुम इतराते रहे।
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'मेरी कविताएँ...',
'लोकेन्द्र विक्रम सिंह'
जीवन, सफर और तलाश...
जीवन की इस जंग में
लड़ने को
इक सफर पर निकले
हम हैं
इक राह मैने पकड़ी
इक राह थामे तुम हो,
कुछ डगर तो
साथ था
इक मोड़ का
अंत आने तक
अब तुम उस ओर हो
और हम इस ओर
तलाश जारी रखे हैं।
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'मेरी कविताएँ...',
'लोकेन्द्र विक्रम सिंह'
कांग्रेस अब बता तू और क्या छीनेगा...
कांग्रेस अब बता तू और क्या छीनेगा...
खाने से दाल छीनी,
मिठाई से चीनी,
गाड़ी से तेल निकाला
तो रसोई से गैस छीनी..
कांग्रेस अब बता तू और क्या छीनेगा...
नौजवानो के सपने छीने,
तो बूढ़ो का छीना चैन,
माँ की अस्मिता लूटी
तो दरिन्दो को ही दिया चैन..
कांग्रेस अब बता तू और क्या छीनेगा...
-लोकेन्द्र
(इस आकाँक्षा के साथ की अब घर की माँ-बहनो की कम से कम इज्जत बख्शेगेँ..)
वो माँ है...
खुद अपने में ही रखकर
जो हमें दुनिया में लाया करती है,
वो माँ है।
अबूझ शब्द जो समझकर
भूख-प्यास मिटाया करती है,
वो माँ है।
खुद अपने कदमो में गिरकर
जो चलना सिखाया करती है,
वो माँ है।
जो अपने सपने खोकर
हमारे सपने पूरा किया करती है,
वो माँ है।
तनहाई के तकलीफ़ो में रहकर
जो हमारी दुनिया बसाया करती है,
वो माँ है।
जो अपनो से दुत्कार खाकर
बच्चो को आशीष दिया करती है,
वो माँ है।
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'लोकेन्द्र विक्रम सिंह',
मेरी कविताएँ
है उठा मंजर जो देखो...
है उठा मंजर जो देखो
बस सिसकियों की टोह है
बिन दुआ के
बिन ख़ुदा के
बिन सुबह के
जिंदगी वीरान है,
है उठा मंजर...........
क्या खता थी उसकी ऐ ख़ुदा
जिसके बाकी अभी कई ख़्वाब थे
सूनी आँखें है टटोलती
जिसे अपनों के आने की कुछ आस है,
कर रहे है अब भी वो बहस
कुर्सी पर बैठे
हाथों में लिए जो जाम है,
है उठा मंजर...........
दिख रहा गिद्धों का झुंड
मौसम जहाँ बदला हुआ है
खंडहर अब भी बचे
देते उस तबाही का प्रमाण है
निकलने लगे है खादी के मेढ़क
देखते हैं दिल्ली का क्या अंजाम है,
है उठा मंजर...........
बस सिसकियों की टोह है
बिन दुआ के
बिन ख़ुदा के
बिन सुबह के
जिंदगी वीरान है,
है उठा मंजर...........
क्या खता थी उसकी ऐ ख़ुदा
जिसके बाकी अभी कई ख़्वाब थे
सूनी आँखें है टटोलती
जिसे अपनों के आने की कुछ आस है,
कर रहे है अब भी वो बहस
कुर्सी पर बैठे
हाथों में लिए जो जाम है,
है उठा मंजर...........
दिख रहा गिद्धों का झुंड
मौसम जहाँ बदला हुआ है
खंडहर अब भी बचे
देते उस तबाही का प्रमाण है
निकलने लगे है खादी के मेढ़क
देखते हैं दिल्ली का क्या अंजाम है,
है उठा मंजर...........
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'मेरी कविताएँ...',
'लोकेन्द्र विक्रम सिंह'
सोमवार, 10 दिसंबर 2012
मै हूँ मानव जात का...
स्वघोषित, आम आदमी पार्टी के समर्थक और आप के सहयोगी के रूप के रूप में जब स्वयं के परिचय में धर्म/जाति को हिन्दू, क्षत्रिय ........ से बदलकर एक आम आदमी किया तो उसके पीछे जो तर्क और शर्त रही, उसे इक नज्म में पिरोने की कोशिश की। जो अब आप सब के सामने है...
मन्दिर का हूँ न मस्जिद का हूँ
न हूँ राम-रहीम का,
इस वक़्त, भागती दुनिया में
मै हूँ एक गरीब का,
अमीर भी हूँ, गरीब भी हूँ,
हूँ मै ख़ुश नसीब भी,
हर वक़्त तौलती दुनिया में
कीमत है सिर्फ जमीर का।
खोया भी हूँ, पाया भी हूँ,
लुटता चला आया भी हूँ,
इक भेद देखना होगा
रिश्ता और जागीर का।
संगी भी हूँ, साथी भी हूँ,
हूँ मै हमसफ़र भी,
इस साथ खोजती दुनिया में
मै हूँ भारत देश का।
लड़ना भी है, पाना भी है,
है खुद के लिये छीनना भी,
ये लक्ष्य रखेगें तभी
जब होगा मानव जात का।
हर जख्म की जिसे शह है मेरी...
करता रहा वार, हर जख्म की जिसे शह है मेरी,
सिर्फ अपने ही गम दिखाकर, छीनी कुर्बनियत मेरी।
हवायें भी अक्सर...
अब तो हवायें भी अक्सर अपना रुख मोड़ लेती हैं,
शर्म ओढ़े चेहरे से पल्लू जब सरकता है।
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