सोमवार, 27 जुलाई 2009

"मासूम शाम आ गई..."

कई दिनों से यहाँ मै लिखने से दूर रहा। इस बीच मैंने कुछ लिखा भी तो उसे यहाँ लिखने का मन नही हो पाया और कुछ व्यस्तता ऐसी रही की यहाँ से दूरी भी बनी रही। एक बार फ़िर आप लोगो से उस दूरी को हटाते हुए, मै यहाँ अपनी कुछ भावनाओं को कुछ पंक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ........




खोई हुई हैं महफिलें
खोया है इक समां प्यारा
तलाश करने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई,

खोये हैं जीवन के कुछ पहलू
खोये हैं कई फ़साने भी
सबको समेटने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई,

खोया है इक जश्न सुहाना
खोया है एक कारवां भी
पाने की जब कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई

अब प्रतिज्ञ हूँ न कुछ खोऊँ
अल्फाजों की जागीर भी
दास्ताँ सहेज लूँ डायरी के पन्नो में
लफ्ज कभी भी मिल जायें जो ,
लेखक बनने की जब भी कोशिश की
चलते ही मासूम शाम आ गई !!
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