गुरुवार, 6 अगस्त 2009

"यादों की इक रेल चली..."

बस ऐसे ही एकांत में बैठा था मै की अन्तरमन कुछ पाने को व्यग्र सा हो रहा था। मैंने उसी समय अपनी कलम उठा ली और भावनाओ को एक पन्ने पर दर्ज कर दिया............. उसी एहसास की बातें अब आप लोगों के सामने यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.............
यादों की इक रेल चली है
संगी-साथी लाने को,
पाने को वो हमराही 
जो हमदर्द हमारा होता था, 
यादों की इक रेल...... 

सफर में चलती रही  

इक कारवां के साथ में 
मंजिल अभी मिल न सकी
कुछ राहगीर पाती गई, 
यादों की इक रेल.......

बदगुमाँ माहौल था जब 

मिला न वो हमसफ़र, 
सिसकियों की आड़ में 
वो दास्ताँ कहती गई,
यादों की इक रेल........

कुछ मित्रों को ढूंढ रही थी 

उन सूनी सी राहों पर, 
मस्ती के पल को कैद किए 
जहाँ पर यादें बसतीं थी, 
यादों की इक रेल........

भूली है न वो कुछ भी 

न भटकी है राहों से, 
सब मिल जाता उसको कैसे 
यह ही अब इक प्रश्न बचा, 
यादों की एक रेल चली है 
संगी-साथी लाने को !!
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