मंगलवार, 6 जनवरी 2009

"मेरी जिन्दगी का पहला प्यार..."

जब भी माँ-पापा के प्यार का अहसास उनकी मेरे पास गैर मौजूदगी का अहसास कराता है और इस बात से भी परिचय कराता है की कहीं दूर अपनी जागतीं आंखों में वो मेरे मंजिल पर पहुँचने का सपना संजोये हुए हैं और दोनों उस घड़ी का तत्परता से इंतजार कर रहें होंगे।
मै इस बात की कल्पना भी नही कर सकता की जिस दिन मुझे मेरी मंजिल मिलेंगी, जो मेरी शुरूआती जीवन का आधार होगी। उस दिन मै अपनी खुशी महसूस कर पाऊंगा या नही, लेकिन जो मेरे पैदा होने से, बोलने के शुरुआत से, पहले कदम को बढ़ाने से देखते हुए तथा पहले अक्षर के ज्ञान से, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय की पढ़ाई तक अपने आंखों में सपने कैद किए हुए है। उस दिन की प्राप्ति पर वो कितने खुश होंगे इस बात की गणना मै कल्पना में भी नही कर सकता हूँ।
ये उनके सपने, आशा और अपेक्षा की बात हुई, अब जरा उनके प्यार की बात करते हैं। माँ-पापा के प्यार की तुलना क्या किसी से भी की जा सकती है? मुझ से तो नही हो पाता और शायद कोई कर भी नही सकता है। मै ख़ुद के प्यार से भी उनकी तुलना करने में असमर्थ हूँ, क्योंकि मेरी दुनिया में बहुत से लोग है और उनकी तो दुनिया ही हम से ही सम्बंधित है या कह सकते है की उनकी दुनिया ही हम से है क्योंकि हम ही उनके विश्वास है और हम ही उनके घमण्ड भी है
अपने बच्चो को एक कमीं भी न महसूस होने देने के लिए न जाने उन्होंने अपनी कितनी छोटी-छोटी खुशियों को दबाया है और उस पर उनको और ज्यादा खुशी मिलती है। क्योंकि हम खुश होते है। हमारी छोटी से बड़ी जरूरतों का अहसास उन्हें बिना हमारे बताएं ही हो जाता है और फिर उसको पूरा करने की समस्या अब उनकी हुई और अब भी उनको उसे पूर्ण करके ही संतुष्टि मिलती है।
हमें स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते हुए, हमें गर्व देते हुए और हमारी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करते हुए अब वों बूढ़े हो चले है, उनके कंधे अब जल्दी थकान महसूस करतें हैं, लेकिन तत्परता और जुझारूपन अब भी पहले से ज्यादा है और हमें हमारी मंजिलो तक पहुँचाने में हम से कहीं ज्यादा सहयोगी है। हम कही गिरे तो संभाला इन्होने ने ही है और ऐसी मजबूती दी की ख़ुद के फिसलने की बात गई, हम औरों को सम्भालने लगें।
लोग कहते की मै अभी बच्चा हूँ लेकिन उन्होंने कभी मुझे बड़ा महसूस ही नही किया बचपन में भी मुझे नींद न आने पर माँ मेरे पास बैठ कर तब तक कहानियाँ सुनाया करतीं थी जब तक की मै सो न जाऊँ और अब भी वो साथ हो और मै सोऊ न तो वो मेरे सोने तक अपनी कहानियाँ सुनाया करतीं हैं।
लेकिन एक चीज है अब वो मुझे जिम्मेदार मानने लगें है और ये की मै स्वयं अपनी जिंदगी की मंजिल तय करते हुए उसका रास्ता बना लूँगा इस विश्वास के साथ उन्होंने कभी मुझ से ख़ुद का कोई सपना पूर्ण करने की अभिलाषा नही रखीं। अगर आकांक्षा रखी भी तो सिर्फ़ मुझ से गर्व पाने की, मुझे खुशी पाने की और दुनिया में मेरी एक पहचान की।
बस यहीं हैं मेरी जिंदगी का पहला प्यार और मेरे माँ-पापा के सपने और उनकी प्यार भरी दुनिया!!
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