बुधवार, 12 अगस्त 2009

"तनहाई..."

लिखा मैंने इसे काफी पहले था लेकिन आज फ़िर से इसे आप सब के सम्मुख पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये रचना तब आई थी जब हम सब मित्र लखनऊ विश्वविद्यालय की जिंदगी में मस्त थे। और देर रात फ़िल्म देख कर और मस्ती करके जब मै अपने कमरे पर आया तो इकदम अकेला था, तब ही जो भावनाए आई उसे एक पन्ने पर दर्ज कर दिया..... वो अब आपके सामने है......


रात की तनहाई में
इक बार फ़िर हम आ ही गए
न चाहते हुए
अपनी कमजोरी छिपा ही गये,
किताबों से दूर हैं
और कलम चलाते गये,
इसी में
अपनों की कमी हटाते गये,

दोस्त खोजते हैं हमें
और हम ख़ुद को छिपाते गये,
जब सामने लाया ख़ुद को
सब मुझ में कमी बतातें गये,
हम भी नादान थे
सबको बातों में उलझातें गये,
सब महसूस करते हुए
वो दिल को बहलाते गये,

भूलतें हैं हम भी
लेकिन बिछड़े याद आतें गये,
क्यों बिछड़े या मिलें हम
इक सवाल उठातें गये,
हर बार भूलने की कोशिश की
यादों की आड़ में हर कदम हटाते गये,

दोस्तों का साथ हुआ
तो दुनिया को खुशी दिखातें गये,
मंजिल की तलाश में हम
इक साथ कदम बढ़ातें गये,
सब मंजिलो की ओर बढ़े
मुझे तनहाई महसूस कराते गये,
तनहाई में इक बार फिर हम आते गये
रात की तनहाई में हम आतें गये !!
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